ईरान एक बार फिर उबाल पर है। आयतुल्लाह अली खामेनेई के शासन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों लोग अब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। दिसंबर 2025 से शुरू हुआ यह आंदोलन 100 से ज्यादा शहरों तक फैल चुका है। युवाओं और महिलाओं की अगुआई में हो रहे ये प्रदर्शन न सिर्फ ईरान बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी चिंता का विषय बन गए हैं।
ईरान में क्यों भड़का जनआक्रोश?
ईरान में विरोध प्रदर्शन की जड़ें गहरी आर्थिक संकट में छिपी हैं। ईरानी मुद्रा रियाल की रिकॉर्ड गिरावट, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों की कीमतों ने आम जनता को सड़कों पर ला दिया। शुरुआत तेहरान के ग्रैंड बाजार से हुई, जहां व्यापारियों ने हड़ताल की। जल्द ही यह आंदोलन राजनीतिक रूप ले बैठा और सरकार विरोधी नारों के साथ खामेनेई प्रशासन के खिलाफ सीधी चुनौती बन गया।
महिलाएं और युवा बने आंदोलन की ताकत
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी है। सख्त सामाजिक नियमों और बेरोजगारी से त्रस्त युवा वर्ग खुलकर विरोध कर रहा है। सुरक्षा बलों की कार्रवाई में हजारों लोगों की मौत और गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। हालात काबू में रखने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई हैं, जिससे सही जानकारी मिलना बेहद मुश्किल हो गया है।
भारत के लिए ईरान क्यों है रणनीतिक रूप से अहम?
ईरान भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार है। चाबहार बंदरगाह में भारत का करीब 500 मिलियन डॉलर का निवेश है, जो पाकिस्तान को बायपास कर मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंच का रास्ता देता है। इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत के व्यापार को तेज और सस्ता बनाता है। तेल, सूखे मेवे और चावल का व्यापार भी दोनों देशों को जोड़ता है।
भारत पर क्या पड़ सकता है सीधा असर?
अगर ईरान में अस्थिरता लंबी चली तो भारत को कई मोर्चों पर नुकसान झेलना पड़ सकता है। चाबहार और रेल परियोजनाओं में देरी हो सकती है। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, जिससे महंगाई और बढ़ेगी। बासमती चावल के निर्यात पर असर पड़ेगा और भारतीय निर्यातकों का पैसा फंस सकता है।
सरकार की रणनीति और आगे की राह
भारत सरकार फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की नीति पर चल रही है। भारतीय नागरिकों को सतर्क रहने और दूतावास के संपर्क में रहने की सलाह दी गई है। अगर ईरान में राजनीतिक बदलाव होता है और नई सरकार भारत के साथ सहयोग बढ़ाती है, तो भारत को रणनीतिक फायदा हो सकता है। लेकिन लंबे समय तक अस्थिरता भारत की आर्थिक और कूटनीतिक योजनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है।