Iran Protests: 2026 की शुरुआत में ईरान के 50 से अधिक शहरों में फैले हिंसक प्रदर्शनों ने देश की गहरी आर्थिक और सामाजिक परेशानियों को उजागर कर दिया है। महंगाई, बेरोजगारी और सरकारी सख्ती के खिलाफ लोग सड़कों पर हैं। कई इलाकों में इंटरनेट बंद है और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें जारी हैं। इसी पृष्ठभूमि में यह सवाल फिर चर्चा में है कि इस्लाम से पहले ईरान का मूल धर्म क्या था और उस धर्म को मानने वाले लोग आज किस हाल में हैं।
हज़ारों साल तक राजकीय पहचान
इस्लाम के आगमन से पहले ईरान में पारसी धर्म का प्रभुत्व था। पैगंबर जोरोस्टर द्वारा स्थापित यह दुनिया के सबसे प्राचीन एकेश्वरवादी धर्मों में गिना जाता है। अचमेनिद, पार्थियन और ससानियन साम्राज्यों के दौर में यह ईरान का आधिकारिक धर्म रहा और शासन, कानून व सामाजिक व्यवस्था पर इसका गहरा प्रभाव था।
प्राचीन ईरान की खास पहचान
हालांकि पारसी धर्म प्रमुख था, लेकिन प्राचीन ईरान पूरी तरह एकधर्मी नहीं था। यहां मैनिकेइज्म, मजदकिज्म जैसी मान्यताएं भी मौजूद थीं। इसके अलावा यहूदी, ईसाई और बौद्ध समुदाय अलग-अलग क्षेत्रों में बसे हुए थे, जिससे ईरान एक बहुधार्मिक समाज बना रहा।
धर्म और समाज में मोड़
सातवीं सदी में अरब विजय के बाद इस्लाम धीरे-धीरे ईरान का प्रमुख धर्म बन गया। समय के साथ बड़ी संख्या में पारसियों ने धर्म परिवर्तन किया, कुछ पलायन कर गए और कई सामाजिक रूप से हाशिये पर चले गए। उत्पीड़न से बचने के लिए एक बड़ा समूह भारत आया, जिन्हें आज पारसी समुदाय के रूप में जाना जाता है।
आज की स्थिति
वर्तमान ईरान में पारसी समुदाय को संवैधानिक रूप से अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है। उनकी आबादी सीमित होकर लगभग 15 से 25 हजार के बीच मानी जाती है। उन्हें धर्म पालन और संसद में एक आरक्षित सीट की अनुमति है, लेकिन धर्म परिवर्तन, नए अग्नि मंदिर निर्माण और उच्च सरकारी या सैन्य पदों पर जाने पर कई कानूनी पाबंदियां अब भी लागू हैं।