ईरान की सड़कों पर गुस्सा, नाराज़गी और विद्रोह कोई नई बात नहीं है। युवा, महिलाएं और छात्र लगातार सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि बार-बार भड़कने वाले ये आंदोलन सत्ता परिवर्तन तक क्यों नहीं पहुंच पाते? इसकी वजह सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि ईरान का वह कठोर सत्ता तंत्र है, जिसकी रीढ़ बने हैं IRGC और बासिज जैसे संगठन।
IRGC: सेना से आगे, एक समानांतर सत्ता
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ईरान की सामान्य सेना नहीं है। यह एक ऐसी समानांतर सत्ता है जो सैन्य, आर्थिक और खुफिया ताकत को एक साथ नियंत्रित करती है। तेल, बंदरगाह, निर्माण, टेलीकॉम जैसे बड़े आर्थिक सेक्टरों में IRGC की गहरी पकड़ है। इसकी वफादारी सीधे सुप्रीम लीडर से होती है, न कि चुनी हुई सरकार से। यही कारण है कि सरकार बदलने से सत्ता संरचना नहीं बदलती।
बासिज: समाज के भीतर बैठा डर
अगर IRGC सत्ता की ढाल है, तो बासिज उसका सामाजिक हथियार। बासिज कोई सीमित मिलिशिया नहीं, बल्कि समाज के भीतर फैला एक नेटवर्क है। आम नागरिक, दुकानदार, छात्र—कोई भी इसका हिस्सा हो सकता है। मुखबिरी और निगरानी यहां सामान्य बात है। विरोध करने वाला व्यक्ति सिर्फ सरकार से नहीं, अपने ही समाज से टकरा जाता है
मनौवैज्ञानिक दमन की रणनीति
ईरानी शासन विरोध को केवल बल से नहीं कुचलता, बल्कि मानसिक रूप से तोड़ देता है। लंबे समय तक जेल, यातना, अकेला सेल और लगातार पूछताछ इसका हिस्सा हैं। जेल से बाहर आने के बाद भी व्यक्ति सामाजिक बहिष्कार झेलता है। नौकरी, शादी और सामान्य जीवन तक मुश्किल हो जाता है। एक व्यक्ति नहीं, उसका पूरा भविष्य सजा पाता है।
नेतृत्व शून्यता और इंटरनेट ब्लैकआउट
हर बड़े आंदोलन के बाद उभरते नेताओं को या तो जेल भेज दिया जाता है या देश से बाहर कर दिया जाता है। नतीजा—कोई चेहरा, कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं बचता। जैसे ही प्रदर्शन तेज होते हैं, इंटरनेट बंद कर दिया जाता है, जिससे समन्वय टूट जाता है और आंदोलन बिखर जाता है।
बाहरी दबाव क्यों नहीं करता असर
प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय दबाव या सैन्य धमकियां ईरान में सत्ता को कमजोर नहीं करतीं। उल्टा शासन इसे “देश बनाम दुश्मन” की लड़ाई बनाकर पेश करता है। इससे IRGC खुद को राष्ट्ररक्षक बताकर और मजबूत हो जाता है। जब तक सुरक्षा बलों के भीतर दरार नहीं पड़ती, सत्ता परिवर्तन लगभग असंभव बना रहता है।