पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर वार्ता शुरू हो गई है, जिसने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार दोनों देश इतने बड़े स्तर पर आमने-सामने बातचीत कर रहे हैं। इस अहम बैठक में अमेरिका की ओर से जेडी वेंस नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि ईरान की तरफ से मोहम्मद बाघेर गालिबाफ शामिल हैं।
भरोसे की कमी सबसे बड़ी बाधा
हालांकि बातचीत शुरू हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी है। ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि अगर यह वार्ता विफल होती है, तो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ इजराइल पर नहीं होगी, बल्कि अमेरिका को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। ईरान का कहना है कि इजराइल और अमेरिका के फैसले आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए किसी भी नतीजे के लिए दोनों जिम्मेदार होंगे।
तनाव के बीच सख्त संदेश और शर्तें
इस वार्ता से पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को चेतावनी दी कि अगर शांति समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई कर सकता है। वहीं ईरान ने भी अपनी शर्तें साफ रखी हैं, जिसमें लेबनान में चल रही लड़ाई को रोकना और अपने फंसे हुए अरबों डॉलर के फंड को जारी करने की मांग शामिल है। हालांकि अमेरिका इन शर्तों को मानने के मूड में नजर नहीं आ रहा है।
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चीन की एंट्री से बदले समीकरण
इस बीच चीन की एंट्री ने इस वार्ता को और अहम बना दिया है। खबर है कि चीन का प्रतिनिधिमंडल भी इस्लामाबाद पहुंच रहा है, जो मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। अगर कोई समझौता होता है, तो चीन उसकी गारंटी देने की स्थिति में भी आ सकता है, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन पर असर पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट तनाव का वैश्विक असर
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर अब पूरी दुनिया पर दिखने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल सप्लाई पर खतरा बढ़ रहा है, जिससे यूरोप में जेट फ्यूल की कमी का संकट गहरा सकता है। वहीं लेबनान में हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच हमले जारी हैं, जिससे हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। ऐसे में इस्लामाबाद की यह वार्ता सिर्फ दो देशों के बीच नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।