ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, रुपये की कमजोरी, सोने की बढ़ती कीमतें और महंगाई का दबाव भारत जैसे आयातक देशों पर भी दिखाई देने लगा है। इसका सीधा असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और खर्चों पर पड़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में फिर आई तेजी
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और लाल सागर में तेल टैंकरों पर हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। इससे पहले मार्च-अप्रैल में भी क्षेत्रीय तनाव के दौरान कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो कीमतों में फिर और बढ़ोतरी हो सकती है।
रुपये पर बढ़ा दबाव
भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है, जिसका असर भारतीय मुद्रा पर भी पड़ता है। हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है, जिससे विदेश से आने वाली कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है।
महंगाई बढ़ने का खतरा
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे फल, सब्जियां, दूध, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के कई सामान महंगे हो सकते हैं। यही कारण है कि तेल की कीमतों में तेजी का असर आम लोगों की जेब पर भी महसूस होता है।
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सोने की कीमतों में बढ़ी तेजी
वैश्विक तनाव के दौरान निवेशक अक्सर शेयर बाजार से पैसा निकालकर सोने में निवेश करते हैं। इसी वजह से हाल के घटनाक्रम के बीच सोने की मांग बढ़ी है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतों में भी उछाल देखा गया है। ऐसे माहौल में सोने को सुरक्षित निवेश विकल्प माना जाता है।
EMI पर भी पड़ सकता है असर
यदि महंगाई लगातार ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती करना कठिन हो सकता है। इसका असर होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। ऐसे में लोगों को EMI में राहत मिलने की उम्मीदें भी कमजोर हो सकती हैं।
आम लोगों के लिए क्यों है चिंता की बात?
अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर धीरे-धीरे आम उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई, कमजोर रुपया, महंगा सोना और ब्याज दरों पर दबाव जैसी कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं। आने वाले समय में वैश्विक हालात और ऊर्जा बाजार की दिशा तय करेगी कि इनका असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर कितना पड़ता है।