पश्चिम एशिया में जारी ईरान-इजरायल संघर्ष का असर अब मध्य प्रदेश तक गहराई से पहुंच चुका है। खासतौर पर Raisen जिले का बासमती चावल कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। यहां से निर्यात होने वाले चावल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में जाता था, लेकिन युद्ध के चलते शिपिंग रुकने, लागत बढ़ने और मांग घटने से पूरा व्यापार लगभग ठप हो गया है, जिससे किसान और उद्योग दोनों संकट में हैं।
रायसेन का बासमती कारोबार पूरी तरह प्रभावित
मध्य प्रदेश का रायसेन जिला बासमती चावल निर्यात का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां तैयार होने वाला पूसा बासमती चावल खासतौर पर Middle East के देशों में बड़ी मात्रा में भेजा जाता था। लेकिन ईरान-इजरायल युद्ध के बाद शिपमेंट रुकने से मिलों की मशीनें थम गई हैं और करोड़ों का कारोबार अचानक बंद हो गया है।
खाड़ी देशों पर निर्भरता बनी बड़ी वजह
भारतीय बासमती चावल का बड़ा बाजार पश्चिम एशिया ही रहा है। Saudi Arabia, Iran और Iraq जैसे देश प्रमुख खरीदार हैं। रायसेन के निर्यातकों का कहना है कि उनके उत्पाद की मांग यूरोप या अन्य बाजारों में सीमित है, जिससे अचानक बाजार बदलना मुश्किल हो गया है।
ढुलाई लागत में भारी उछाल, कंटेनर संकट
युद्ध के चलते समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ गया है, जिससे माल ढुलाई की लागत तीन गुना तक बढ़ गई है। पहले जहां एक कंटेनर भेजने में करीब 2500 डॉलर खर्च होता था, वहीं अब यह 7000 से 9000 डॉलर तक पहुंच गया है। साथ ही कंटेनरों की कमी और शिपमेंट ट्रैकिंग में दिक्कतों ने व्यापार को और संकट में डाल दिया है।
किसानों और मिल मालिकों पर बढ़ा कर्ज
व्यापार ठप होने से सबसे ज्यादा असर किसानों और चावल मिल संचालकों पर पड़ा है। हजारों टन चावल गोदामों में फंसा हुआ है, जबकि निर्यातकों पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। कई व्यापारियों ने प्रोसेसिंग बंद कर दी है और बैंक की किस्त चुकाने में परेशानी आ रही है, जिससे पूरे सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ गया है।
कीमतों में गिरावट, नए बाजार की तलाश
बाजार ठप होने के कारण बासमती चावल की कीमतों में भी गिरावट आई है। पूसा बासमती के दाम 300-500 रुपये प्रति क्विंटल तक कम हो गए हैं। ऐसे में कुछ निर्यातक अब वैकल्पिक बाजारों की तलाश में जुटे हैं, लेकिन नई सप्लाई चेन बनाना आसान नहीं है। जब तक समुद्री रास्ते सामान्य नहीं होते, तब तक इस संकट के खत्म होने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।