ईरान से जुड़े युद्ध के असर अब अमेरिका में साफ दिखने लगे हैं। मार्च महीने में फूड और बेवरेज सेक्टर की महंगाई 7.9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले एक साल में सबसे ज्यादा है। फरवरी में यह आंकड़ा 4.2 प्रतिशत था, यानी सिर्फ एक महीने में तेज उछाल दर्ज किया गया। यह संकेत है कि आने वाले समय में आम लोगों की जेब पर और दबाव बढ़ सकता है।
सब्जियों और ईंधन में भारी उछाल
महंगाई का सबसे ज्यादा असर रोजमर्रा की चीजों पर पड़ा है। टमाटर की कीमत में सालाना आधार पर 102 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि सब्जियों की कीमतें 90 प्रतिशत तक बढ़ गईं। वहीं डीजल के दाम 88 प्रतिशत तक उछल गए। इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी है, जो युद्ध के बाद लगातार ऊपर जा रही है।
होर्मुज संकट से बढ़ी चिंता
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण तेल की वैश्विक सप्लाई प्रभावित हुई है। इस रास्ते से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल सप्लाई होता है। जैसे ही यहां संकट गहराया, तेल की कीमतें बढ़ने लगीं। अमेरिका ने इस दौरान अपने निर्यात को भी बढ़ाया, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
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खेत से बाजार तक बढ़ी लागत
तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहा। फर्टिलाइजर और प्लास्टिक जैसे उत्पाद भी महंगे हो गए हैं। यूरिया की कीमत फरवरी से दोगुनी हो चुकी है, जिससे किसानों की लागत बढ़ गई है। इसका असर अब थोक महंगाई पर दिख रहा है और आने वाले समय में खुदरा महंगाई भी बढ़ने की आशंका है।
एशिया की सप्लाई चेन पर असर
एशिया के कई देश पश्चिम एशिया से तेल पर निर्भर हैं। सप्लाई में कमी आने से वहां उत्पादन प्रभावित हो रहा है। इसका सीधा असर अमेरिका पर पड़ सकता है, क्योंकि वहां बिकने वाला करीब आधा सामान एशिया से आता है। अगर फैक्ट्रियों का उत्पादन घटा, तो अमेरिका में सामान की कमी हो सकती है।
ग्लोबल असर और बढ़ती चिंता
मिडिल ईस्ट से दुनिया का बड़ा हिस्सा प्लास्टिक और फर्टिलाइजर सप्लाई होता है। पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलीएथिलीन जैसे उत्पादों की सप्लाई प्रभावित होने लगी है। साथ ही सल्फर और अन्य केमिकल्स की उपलब्धता पर भी असर पड़ रहा है। अगर युद्ध लंबा चलता है, तो इसका असर सिर्फ अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।