अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन हालिया बयानों के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में आ गया है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है। ट्रंप का कहना है कि मादुरो का समय अब सीमित है और उन्होंने सैन्य विकल्प से भी इनकार नहीं किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक फोन कॉल में मादुरो से सत्ता छोड़ने को कहा गया था, लेकिन वेनेजुएला ने इसे ठुकरा दिया। इसी के बाद अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या हालात और बिगड़ सकते हैं।
अगर टकराव बढ़ा तो वेनेजुएला के साथ कौन खड़ा होगा
विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी संभावित संघर्ष में वेनेजुएला अकेला नहीं रहेगा। रूस लंबे समय से उसका अहम सहयोगी रहा है और सैन्य व राजनीतिक स्तर पर उसका समर्थन करता आया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी रूस अक्सर वेनेजुएला के पक्ष में बोलता है। चीन भी वेनेजुएला में बड़े आर्थिक और ऊर्जा हित रखता है। वह सीधे सैन्य दखल न दे, लेकिन कूटनीतिक और आर्थिक मदद जरूर कर सकता है। इसके अलावा क्यूबा वेनेजुएला का पारंपरिक साथी है, जो राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन देने में पीछे नहीं हटेगा।
अमेरिका के साथ किन देशों के आने की संभावना
अमेरिका को पश्चिमी देशों का मजबूत साथ मिलने की उम्मीद है। नाटो के प्रमुख सदस्य जैसे ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस और जर्मनी आमतौर पर अमेरिकी रुख का समर्थन करते रहे हैं। एशिया में जापान और दक्षिण कोरिया अमेरिका के करीबी रणनीतिक साझेदार हैं और किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट में उसके साथ खड़े हो सकते हैं। लैटिन अमेरिका में स्थिति थोड़ी जटिल है। कुछ देश अमेरिका के साथ सुरक्षा और व्यापारिक रिश्तों के कारण उसका समर्थन कर सकते हैं, जबकि कई देश तटस्थ रहने की कोशिश करेंगे।
समर्थन का फैसला हालात तय करेंगे
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी भी देश का पक्ष लेना सीधा फैसला नहीं होता। यह उसके आर्थिक हितों, सुरक्षा जरूरतों और क्षेत्रीय संतुलन पर निर्भर करता है। अगर अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तनाव और बढ़ता है, तो कई देश हालात देखकर ही कदम उठाएंगे। फिलहाल इतना साफ है कि यह सिर्फ दो देशों का मामला नहीं रह गया है। पूरी दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि आगे बयानबाजी थमती है या कूटनीति की जगह टकराव ले लेता है। आने वाले दिनों में वैश्विक संतुलन किस दिशा में जाएगा, यही सबसे बड़ा सवाल है।