आषाढ़ शुक्ल द्वितीया (27 जून 2025) से 5 जुलाई 2025 तक पुरी (ओडिशा) में जगन्नाथ रथ यात्रा का महोत्सव लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करेगा। मान्यता है कि केवल रथ खींचना ही नहीं, बल्कि “महाप्रसाद” का एक कण भी ग्रहण करना अनेकों यज्ञों के समान पुण्य
देता है। मिट्टी के सात सतरों वाले हांड़ों में पकाई जाने वाली यह 56 भोगों की थाली 500 महारसोइयों और 300 सहयोगियों की मेहनत से तैयार होती है, जिसे भक्त प्रेम से “जगन्नाथ के भात” कहकर पुकारते हैं, क्योंकि यहां मिलने वाले चावल-खिचड़ी-दाल-साग का प्रसाद
हाथों-हाथ जगत में बंटता है।
रथ यात्रा 2025: तिथियां और महत्व
शुभारंभ: 27 जून 2025, आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
समापन: 5 जुलाई 2025, दशमी तिथि
भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा तीन अलग-अलग रथों में श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक नौ दिन प्रवास करते हैं। रथ की रस्सी खींचना मोक्ष के समान माना गया है।
मिट्टी
के बर्तनों में पकता है
प्रसाद
महाप्रसाद की तैयारी में सात बड़े मिट्टी के बर्तन एक-दूसरे पर क्रमवार रखे जाते हैं। सबसे ऊपर का हांड़ा पहले पक जाता है—इसे भक्त ‘देवता का चमत्कार’ मानते हैं। प्रसाद सौरभ और स्वाद दोनों में अद्वितीय माना जाता है।
दुनिया का सबसे बड़ा रसोईघर
पुरी जगन्नाथ मंदिर परिसर की महारसोई में एक दिन में 2,000 से 2 लाख भक्तों के लिए भोजन बन सकता है। ईंधन के रूप में अब भी पारंपरिक लकड़ी का चूल्हा उपयोग होता है, जिससे प्रसाद का विशिष्ट ‘धुँआ-सुगंध’ बना रहता है।
छत्तीसगढ़ में भी बनता है महाप्रसाद
पुरी के अलावा गरियाबंद (छत्तीसगढ़) के कुछ जगन्नाथ मंदिरों में भी परंपरागत विधि से महाप्रसाद तैयार होता है। फर्क इतना कि वहाँ मुख्य भोग मालपुआ है, जबकि पुरी में चावल-खिचड़ी प्रधान है।
‘56 भोग’ की महिमा
महाप्रसाद को 56 भोग कहा जाता है—आठ पहर (24 घंटे) × सात दिन = 56। इसमें दालमा, केसरिया केसरीभात, पौंगल, खाजा, पाईठा, साग इत्यादि शामिल हैं। भक्त इसे साझा करके ‘अन्न-ब्राह्मण’ परंपरा निभाते हैं।
श्रद्धा, विज्ञान और रहस्य
अद्भुत वास्तु, लकड़ी की रथ-निर्माण तकनीक तथा बिना प्रेसर के मिट्टी के हांड़ो में समान रूप से पका भोजन आज भी वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय है, जबकि श्रद्धालुओं के लिए यह सीधा ईशसाक्षात्कार।