
जैन धर्म में धनतेरस केवल भौतिक समृद्धि का नहीं, आध्यात्मिक उत्थान का पर्व है। इस दिन धार्मिक ग्रंथों व ज्ञान की पूजा के साथ दान-परोपकार का विशेष महत्व है। भगवान महावीर के त्याग मार्ग को याद करते हुए, जैन अनुयायी जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र दान करते हैं। धनतेरस जहां हिंदू समाज में धन, वैभव और लक्ष्मी पूजन का पर्व माना जाता है, वहीं जैन धर्म में यह दिन भौतिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक है। जैन अनुयायी इस दिन भगवान महावीर के त्याग और तपस्या के मार्ग को स्मरण करते हुए दान, धर्म और आत्म-साधना का संकल्प लेते हैं। इस वर्ष जैन धनतेरस 18 अक्टूबर 2025 को मनाई जाएगी।
जैन धर्म में धनतेरस का आध्यात्मिक अर्थ
धनतेरस के दिन जैन धर्म में दान और परोपकार का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, पैसे और अन्य आवश्यक वस्तुएं दान करना शुभ माना जाता है। जैन धर्म के अनुसार, दान केवल आर्थिक मदद नहीं है, बल्कि यह कर्म और पुण्य का माध्यम भी है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक संतोष लाता है। धनतेरस पर किया गया दान परिवार में खुशहाली, सुख-शांति और सामंजस्य बढ़ाने में मदद करता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि धन का सही उपयोग और दूसरों की मदद करना जीवन में सच्ची समृद्धि लाता है।
भगवान महावीर से जुड़ी परंपरा
धनतेरस का यह पर्व भगवान महावीर के जीवन से भी गहराई से जुड़ा है। जैन परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान महावीर ने सांसारिक संपत्ति और इच्छाओं का त्याग कर आत्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग को अपनाया था। उनके इस त्याग ने जैन अनुयायियों को सिखाया कि सच्ची समृद्धि भौतिक नहीं, बल्कि आत्मिक होती है। इसी प्रेरणा के चलते धनतेरस पर जैन समाज भौतिक पूजन के साथ-साथ धार्मिक ग्रंथों, साधना और संयम की आराधना करता है।