उत्तर प्रदेश में सियासत की गोटियां एक बार फिर जमने लगी हैं. बीजेपी जहां योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हिंदुत्व एजेंडे को धार दे रही है, वहीं अखिलेश यादव भी अब उसी पिच पर उतरने की तैयारी में हैं. सावन का पहला सोमवार 14 जुलाई को है, और इसी दिन अखिलेश यादव बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करेंगे.
50 हजार यादव बंधु संग होगा शक्ति प्रदर्शन
सावन में काशी हरिद्वार के बाद दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ स्थल बन जाता है. इस बार चंद्रवंशी गोप समिति के आह्वान पर देशभर से 50 हजार यादव बंधु बाबा विश्वनाथ के जलाभिषेक में हिस्सा लेंगे. यह परंपरा 1952 में तेजू सरदार ने शुरू की थी, जिसमें अब अखिलेश की मौजूदगी सियासी संदेश दे रही है.
M-Y समीकरण से आगे बढ़ने की कवायद
सपा लंबे समय से मुस्लिम-यादव समीकरण के सहारे सत्ता में आती रही है, लेकिन 2014 के बाद से बीजेपी के उभार ने यह समीकरण कमजोर कर दिया. अब अखिलेश ‘पीडीए’ और सामाजिक न्याय के एजेंडे से आगे बढ़ते हुए अपनी छवि बदलने की कोशिश में हैं.
सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर सपा प्रमुख
अखिलेश यादव अब सीधे धार्मिक प्रतीकों से जुड़कर सॉफ्ट हिंदुत्व का संदेश देना चाहते हैं. गंगा जल, काशी विश्वनाथ और शिव आराधना के जरिए वह संकेत दे रहे हैं कि सपा अब सिर्फ एक जाति या समुदाय की पार्टी नहीं रहना चाहती.
बीजेपी की पिच पर सपा की सियासी बैटिंग
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अखिलेश की मजबूरी भी है. बीजेपी जिस हिंदू वोट बैंक को सहेज रही है, उसी में सेंध लगाने की कोशिश में अब अखिलेश भी मंदिर राजनीति कर रहे हैं. लेकिन यह दांव जोखिम भरा है—क्योंकि एक ओर बीजेपी सवाल उठाएगी, तो दूसरी ओर मुस्लिम वोटर भी असमंजस में आ सकता है.
आस्था या राजनीति?
अखिलेश यादव की काशी यात्रा आस्था है या रणनीति—यह तय करना मुश्किल है. लेकिन इतना तय है कि 2027 की तैयारी अब मंदिर से होकर गुजर रही है.