Janmashtami 2026: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के समय मथुरा की जेल में देवकी और वसुदेव के घर श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। भगवान का अवतार अत्याचारी कंस के आतंक का अंत करने और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था। कृष्ण जन्म की कहानी कंस, देवकी और वसुदेव से शुरू होती है। आइए जानते हैं जन्माष्टमी से जुड़ी इस प्रसिद्ध पौराणिक कथा को विस्तार से।
पिता की गद्दी छीनकर राजा बना कंस
पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में मथुरा पर राजा उग्रसेन का शासन था। उनका पुत्र कंस स्वभाव से बेहद क्रूर और महत्वाकांक्षी था। उसने अपने ही पिता को बंदी बनाकर राजगद्दी पर कब्जा कर लिया। सत्ता मिलने के बाद उसका अत्याचार लगातार बढ़ता गया और मथुरा की प्रजा उसके शासन से परेशान रहने लगी। कंस अपनी बहन देवकी से बेहद स्नेह करता था। देवकी का विवाह यदुवंश के वीर वसुदेव से हुआ। विवाह के बाद कंस खुद रथ चलाकर बहन और बहनोई को उनके घर पहुंचाने जा रहा था। तभी रास्ते में अचानक आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान ही कंस की मृत्यु का कारण बनेगी। यह सुनते ही कंस का व्यवहार बदल गया। उसने तलवार निकालकर देवकी पर हमला करने की कोशिश की। देवकी ने भाई से वसुदेव को जीवनदान देने की गुहार लगाई और वादा किया कि उनकी हर संतान को वह कंस के हवाले कर देंगी। कंस ने वसुदेव को तो नहीं मारा, लेकिन दोनों को मथुरा के कारागार में कैद कर दिया।
एक-एक कर मार दीं देवकी की छह संतानें
कारागार में देवकी और वसुदेव के बच्चों का जन्म हुआ। कंस ने अपनी मृत्यु के डर से नवजात बच्चों को भी नहीं छोड़ा। धार्मिक कथा के अनुसार देवकी की पहली छह संतानों को कंस ने जन्म लेते ही मार डाला। सातवीं संतान के समय भगवान की लीला से स्थिति बदल गई। इसके बाद देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समय नजदीक आने लगा। कंस को डर था कि भविष्यवाणी सच न हो जाए, इसलिए उसने जेल की निगरानी और कड़ी कर दी। उधर गोकुल में नंद बाबा की पत्नी यशोदा भी प्रसव के समय के करीब थीं।
आधी रात को हुआ कान्हा का जन्म
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में देवकी ने श्रीकृष्ण को जन्म दिया। धार्मिक मान्यता है कि जन्म के समय भगवान विष्णु अपने दिव्य स्वरूप में देवकी और वसुदेव के सामने प्रकट हुए। भगवान ने वसुदेव को बताया कि वे कंस के अत्याचार का अंत करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं। उन्होंने वसुदेव को आदेश दिया कि वे बालक को गोकुल ले जाएं और नंद-यशोदा के यहां छोड़ आएं। कुछ समय बाद भगवान ने सामान्य शिशु का रूप धारण कर लिया। इसी दौरान कारागार के सैनिक गहरी नींद में चले गए और जेल के दरवाजे भी खुल गए।
उफनती यमुना ने कृष्ण के लिए बनाया रास्ता
वसुदेव ने नवजात कृष्ण को एक टोकरी में रखा और रात के अंधेरे में गोकुल की ओर निकल पड़े। उस समय तेज बारिश हो रही थी और यमुना का जल भी उफान पर था। वसुदेव जब नदी में उतरे तो यमुना का जल लगातार बढ़ रहा था। कथा के अनुसार जैसे ही बाल कृष्ण के चरण यमुना के जल से स्पर्श हुए, नदी का प्रवाह शांत हो गया और वसुदेव के लिए आगे बढ़ने का मार्ग बन गया। काफी कठिनाई के बाद वसुदेव गोकुल पहुंचे। वहां उन्होंने कृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और उनके यहां जन्मी कन्या को अपने साथ लेकर वापस मथुरा के कारागार लौट आए।
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कंस के हाथ से निकल गई कन्या
सुबह कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की खबर मिली। वह तुरंत कारागार पहुंचा और नवजात कन्या को देवकी की गोद से छीन लिया। कंस ने जैसे ही उसे पत्थर पर पटकने की कोशिश की, वह उसके हाथ से छूटकर आकाश में पहुंच गई। कथा के अनुसार वह कन्या देवी के रूप में प्रकट हुई और कंस को चेतावनी दी कि जिसे वह अपना शत्रु समझकर खोज रहा है, वह जन्म ले चुका है और गोकुल में सुरक्षित है। यह सुनकर कंस के होश उड़ गए। उसने कृष्ण को खत्म करने के लिए कई राक्षसों और असुरों को गोकुल भेजा, लेकिन कोई भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सका।
आखिरकार कृष्ण ने कंस का किया वध
समय बीतने के साथ कृष्ण बड़े हुए और उनकी बाल लीलाओं की चर्चा पूरे ब्रज में होने लगी। आगे चलकर श्रीकृष्ण मथुरा पहुंचे और कंस को युद्ध में पराजित कर उसका वध कर दिया। कंस के अंत के साथ मथुरा के लोगों को उसके अत्याचार से मुक्ति मिली। श्रीकृष्ण के जीवन की यह कथा यहीं तक सीमित नहीं रही। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया और कर्म, धर्म तथा कर्तव्य का मार्ग समझाया। इसी वजह से जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और अधर्म पर धर्म की विजय की याद दिलाने वाला पर्व भी माना जाता है।
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