Jashpur Mahishasura Worship: देशभर में जहां नवरात्रि पर मां दुर्गा की भव्य पूजा होती है, वहीं छत्तीसगढ़ के जशपुर में एक ऐसा समुदाय है जो देवी की नहीं, बल्कि राक्षस कहे जाने वाले महिषासुर की पूजा करता है। ये लोग महिषासुर को असुर नहीं, बल्कि अपना पूर्वज मानते हैं और नवरात्रि के साथ-साथ होली-दीपावली पर भी उसकी आराधना करते हैं। यह अनोखी परंपरा न सिर्फ उनकी संस्कृति को अलग पहचान देती है, बल्कि सामाजिक भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ उनके संघर्ष की भी गवाही देती है।
असुर समुदाय और उनकी मान्यता
जशपुर जिले में रहने वाला असुर समुदाय मानता है कि महिषासुर कोई राक्षस नहीं, बल्कि उनके पूर्वज थे। इसीलिए वे दुर्गा पूजा से परहेज करते हैं और महिषासुर की आराधना करते हैं। इन लोगों का कहना है कि इतिहास में महिषासुर की गलत छवि बनाई गई, जबकि वे एक वीर और न्यायप्रिय शासक थे।
गर्व के साथ निभाई जाती है परंपरा
असुर समुदाय के लोग हर साल नवरात्रि में सामूहिक रूप से महिषासुर की पूजा करते हैं। उनके गांव—हाड़ीकोना, जरहापाठ, बुर्जुपाठ और दौनापठा—में विशेष आयोजन होते हैं। हालांकि इस अनूठी परंपरा के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ता है। गांव के अन्य लोग उनका छुआ पानी तक नहीं पीते। इसके बावजूद यह समुदाय अपनी पहचान और परंपरा को गर्व के साथ जिंदा रखे हुए है।
भेदभाव और सामाजिक संघर्ष
जहां एक ओर असुर समुदाय अपनी संस्कृति को संजोए रखता है, वहीं दूसरी ओर वह भेदभाव की पीड़ा भी झेलता है। सामाजिक दूरी और छुआछूत के कारण इन्हें बराबरी का दर्जा नहीं मिल पाता। बावजूद इसके, ये लोग खुद को असुर कहलाने से नहीं कतराते और परंपरा को गर्व से निभाते हैं।