Khandwa News: मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की विंध्याचल पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित मां जयंती माता का प्राचीन मंदिर भक्तों की आस्था का अनोखा केंद्र है। यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए मंदिर की जाली पर पन्नी और नाड़े (धागे) बांधते हैं। मान्यता है कि मां जयंती माता हर सच्ची मनोकामना को पूरी करती हैं। प्राकृतिक सौंदर्य, पौराणिक गाथाओं और अध्यात्म के संगम ने इस मंदिर को अद्भुत बना दिया है।
पन्नी और नाड़े बांधने की परंपरा
इस मंदिर की सबसे खास परंपरा है पन्नी और नाड़े बांधने की। भक्त विश्वास रखते हैं कि जैसे ही माता के दरबार में अपनी इच्छा लिखकर पन्नी बांधी जाती है, वह पूरी हो जाती है। यही कारण है कि दूर-दराज़ से हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने और अपनी कामना पूरी करने के लिए आते हैं।
माता जयंती के प्रकट होने की कथा
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह स्थान इसलिए पवित्र है क्योंकि यहां आदिशक्ति की जिव्हा गिरी थी। तभी से माता यहां जिव्हा स्वरूप में विराजमान हैं। पहले यह स्थान एक छोटी सी कुटिया के रूप में था, जिसे बाद में मंदिर का स्वरूप दिया गया।
नवरात्रियों और सिंदूर चढ़ाने की परंपरा
हर मंगलवार को यहां सिंदूर चढ़ाने की विशेष परंपरा है। साल में चार नवरात्रियां चैत्र, अश्विन और दो गुप्त नवरात्रि धूमधाम से मनाई जाती हैं। चैत्र नवरात्रि के समय नौ दिनों तक विशाल मेला लगता है, जबकि गुप्त नवरात्रियों में साधक विशेष पूजा और हवन करते हैं।
झरना और गुफा का आकर्षण
मंदिर के पास एक अद्भुत झरना है, जो तपती गर्मियों में भी कभी नहीं सूखता। झरने के पास बने भैरव बाबा का मंदिर और पीछे की गुफा श्रद्धालुओं को ठंडी हवा और गहरी शांति का अनुभव कराते हैं।
कठिन लेकिन दिव्य यात्रा
मंदिर तक पहुंचने का सफर भी विशेष है। खंडवा से पुनासा और इंदिरा सागर बांध पार करने के बाद जंगलों के बीच 15-17 किलोमीटर का मार्ग तय करना पड़ता है। वहीं, देवास और खरगोन से आने वाले भक्तों को नदियां पार करनी पड़ती हैं। कठिन मार्ग के बावजूद यहां हर साल हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
राजपरिवार की देखरेख
मंदिर का इतिहास चांदगढ़ के राजा तखत सिंह और उनके दत्तक पुत्र वासुदेव सोलंकी से जुड़ा है। आज भी सोलंकी परिवार इस मंदिर की देखरेख करता है और इसे अपनी कुलदेवी का धाम मानता है।
आस्था और धरोहर का संगम
मां जयंती माता का मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास और अध्यात्म का अद्भुत संगम है। यहां आने वाला हर भक्त सिर्फ दर्शन ही नहीं करता, बल्कि पहाड़ियों की हरियाली, झरनों की ठंडी फुहार और गुफा की शांति का अनुभव करके लौटता है।