भारत विभाजन की विभीषिका को समझाने के लिए छात्रों को अब खास मॉड्यूल के जरिए पढ़ाया जाएगा। 14 अगस्त ‘Partition Horrors Remembrance Day’ के मौके पर कक्षा 6 से 8 और सेकेंडरी स्कूलों के लिए तैयार किए गए इस मॉड्यूल में बताया जाएगा कि आज़ादी के समय हुए बंटवारे ने लाखों लोगों को कैसे दर्द और तकलीफ दी। इसमें यह भी समझाया जाएगा कि जिन्ना, कांग्रेस और माउंटबेटन समेत कई नेताओं के फैसलों ने किस तरह देश को दो टुकड़ों में बांट दिया।
विभाजन की पृष्ठभूमि
1940 में मुस्लिम लीग की लाहौर बैठक में जिन्ना ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग धर्म और परंपराओं वाले समुदाय हैं। यहीं से दो राष्ट्र की मांग को बल मिला। ब्रिटिश सरकार चाहती थी कि भारत आज़ाद हो लेकिन बंटे नहीं। इसके लिए डोमिनियन स्टेटस की योजना दी गई, जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया।
नेताओं के विचार
कांग्रेस के कई नेता शुरू में बंटवारे के खिलाफ थे। सरदार पटेल ने इसे “जबरदस्ती ली जाने वाली दवा” कहा। महात्मा गांधी ने भी इसका विरोध किया, लेकिन हालात ऐसे बने कि अंततः नेहरू और पटेल ने गृहयुद्ध से बचने के लिए बंटवारे को स्वीकार किया।
माउंटबेटन की भूमिका
आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने कहा था कि विभाजन का फैसला भारतीय नेताओं ने लिया था, उनका काम केवल इसे लागू करना था। उन्होंने माना कि जल्दबाजी उनकी गलती थी, लेकिन हिंसा की जिम्मेदारी भारतीयों की थी।
आज की सीख
मॉड्यूल में छात्रों को बताया जाएगा कि विभाजन केवल राजनीतिक फैसलों का नतीजा नहीं था, बल्कि इससे जुड़ा दुख और पीड़ा लाखों परिवारों ने झेला। इस इतिहास से सीख लेकर समाज को एकता और भाईचारे की ओर बढ़ना चाहिए।