Jitiya Vrat 2026: जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व नहीं है, बल्कि बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत कई इलाकों की लोकसंस्कृति में भी इसकी खास जगह है। इस पर्व के दौरान महिलाएं संतान की सलामती, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए निर्जला उपवास रखती हैं। पूजा और व्रत के साथ जितिया के पारंपरिक गीत भी इस पर्व की पहचान माने जाते हैं। साल 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। इस अवसर पर घर-आंगन में महिलाओं के समूह द्वारा लोकगीत गाने की परंपरा आज भी कई क्षेत्रों में कायम है। इन गीतों में मां और संतान के बीच का भावनात्मक रिश्ता बेहद सहज तरीके से सामने आता है। कहीं मां अपने बेटे की लंबी उम्र की प्रार्थना करती है, तो कहीं उसके उज्ज्वल भविष्य और खुशहाल जीवन की कामना सुनाई देती है।
जितिया के गीतों में झलकती है मां की भावना
जितिया के लोकगीतों की सबसे बड़ी खासियत इनकी सरल भाषा और भावनात्मक जुड़ाव है। गीतों के माध्यम से महिलाएं जीवित्पुत्रिका देवता से अपने बच्चों की रक्षा की प्रार्थना करती हैं। लोकभाषा में रचे गए इन गीतों में परिवार, संतान, व्रत की कठिनाई और पूजा की तैयारियों का भी उल्लेख मिलता है। कई पारंपरिक गीतों में व्रत के अलग-अलग चरणों का वर्णन किया जाता है। सप्तमी से लेकर अष्टमी और फिर नवमी के पारण तक की धार्मिक प्रक्रिया लोकगीतों के माध्यम से बताई जाती है। यही वजह है कि ये गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपरा को आगे बढ़ाने का जरिया भी हैं।
'जुग जुग जिए मोर बबुआ...' गीत की खासियत
जितिया के लोकप्रिय लोकगीतों में एक गीत ऐसा है, जिसमें मां अपने दुलारे बच्चे के लिए दीर्घायु की कामना करती है। गीत का मूल भाव यही है कि संतान हमेशा स्वस्थ रहे, उसका जीवन सुखों से भरा हो और वह जीवन में लगातार तरक्की करे। इस लोकगीत में जितिया व्रत की कठिनाई का भी भावपूर्ण चित्रण मिलता है। व्रती महिला अपनी सखी से व्रत की चर्चा करती है और पर्व से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं, पूजा-विधि तथा पारण की तैयारियों का जिक्र करती है। गीत में परिवार की बड़ी महिलाओं से व्रत के नियम जानने और परंपरागत रीति निभाने की भावना भी दिखाई देती है। इसके आगे गीत में जितिया पर्व के दौरान की जाने वाली पूजा और प्रसाद की तैयारियों का लोक अंदाज में वर्णन आता है। चील और सियारिन से जुड़ी लोकमान्यता, जीवित्पुत्रिका की पूजा और पारण के प्रसंग इस गीत को धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।
'जुग जुग जिय ए बबुआ...' में संतान के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना
जितिया के दूसरे लोकप्रिय गीत में मां अपने बेटे के लिए लंबी उम्र के साथ-साथ अच्छे भविष्य की कामना करती है। इसमें संतान को जीवन में आगे बढ़ने, खूब पढ़ने-लिखने और मुश्किल परिस्थितियों से न घबराने का आशीर्वाद दिया जाता है। गीत का भाव यह है कि बच्चे का जीवन हमेशा खुशियों से भरा रहे और उसके चेहरे की चमक कभी कम न हो। मां अपने बच्चे को बुरी नजर और परेशानियों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना करती है। साथ ही वह चाहती है कि उसका बच्चा परिवार का नाम रोशन करे और जीवन में सफलता हासिल करे। इस गीत में मां के त्याग की भावना भी दिखाई देती है। संतान के सुख और स्वास्थ्य के लिए मां कठिन निर्जला व्रत करती है और अपनी सभी मनोकामनाएं बच्चे की खुशहाली से जोड़ देती है। यही भाव जितिया के लोकगीतों को भावनात्मक रूप से बेहद खास बनाता है।
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गांवों में आज भी सुनाई देती है लोकगीतों की गूंज
आधुनिक समय में पर्व मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव जरूर आया है, लेकिन कई ग्रामीण और पारंपरिक परिवारों में जितिया के गीतों की परंपरा अब भी जीवंत है। महिलाएं एक साथ बैठकर गीत गाती हैं और व्रत से जुड़े प्रसंगों को याद करती हैं। इन गीतों के जरिए नई पीढ़ी को भी स्थानीय संस्कृति, लोकभाषा और पुरानी धार्मिक परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। इसलिए जितिया के लोकगीत इस पर्व का केवल सांस्कृतिक हिस्सा नहीं, बल्कि लोकस्मृति और पारिवारिक परंपरा की विरासत भी हैं। जितिया के इन गीतों का मूल संदेश एक ही है—मां की प्रार्थना, संतान के लिए मंगलकामना और परिवार की खुशहाली। यही वजह है कि कठिन व्रत के बीच गाए जाने वाले ये लोकगीत आज भी जितिया पर्व की रौनक और भावनात्मक गहराई को बनाए रखते हैं
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