Jitiya Vrat Parana: जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत संतान की सलामती, लंबी आयु और सुखी जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। खासतौर पर माताएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ करती हैं। जितिया व्रत के दौरान लगभग एक दिन तक अन्न और जल का त्याग किया जाता है। इसके बाद अगले दिन विधि-विधान से व्रत का समापन यानी पारण किया जाता है। जितिया का पर्व तीन चरणों में पूरा होता है। पहले दिन नहाय-खाय की परंपरा होती है, इसके बाद दूसरे दिन निर्जला उपवास रखा जाता है और तीसरे दिन पारण किया जाता है। बिहार और आसपास के क्षेत्रों में पारण की थाली को लेकर कई पारंपरिक मान्यताएं हैं। इस दिन कुछ खास देसी साग, सब्जियों और अनाज से तैयार भोजन करने की परंपरा चली आ रही है।
जितिया पारण में कौन-कौन सी चीजें खाई जाती हैं?
नोनी साग
जितिया के पारंपरिक भोजन में नोनी साग को प्रमुख स्थान दिया जाता है। इसका इस्तेमाल केवल सब्जी बनाने में ही नहीं, बल्कि पकौड़े और दाल तैयार करने में भी किया जाता है। माना जाता है कि इस साग में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी हो सकते हैं। व्रत के बाद इसे साधारण तरीके से पकाकर भोजन में शामिल किया जा सकता है।
अरबी यानी कच्चू
बिहार के कई इलाकों में अरबी को कच्चू के नाम से भी जाना जाता है। यह कंद वाली सब्जी है, जिसे पारंपरिक भोजन का हिस्सा माना जाता है। इसमें फाइबर के साथ पोटैशियम, मैग्नीशियम और विटामिन सी जैसे पोषक तत्व मिलते हैं। व्रत खोलने के बाद अरबी को कम मसाले और कम तेल में बनाकर खाना बेहतर विकल्प हो सकता है।
तोरई
लंबे समय तक उपवास करने के बाद ऐसी सब्जी लेना ठीक माना जाता है जो पेट पर ज्यादा बोझ न डाले। तोरई इसी तरह की हल्की सब्जियों में गिनी जाती है। इसमें फाइबर के अलावा विटामिन ए, विटामिन सी, आयरन और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। पारण की थाली में इसे कम तेल और हल्के मसालों के साथ शामिल किया जा सकता है।
मंडुआ या रागी
मंडुआ, जिसे रागी भी कहा जाता है, पारंपरिक अनाजों में शामिल है। इसमें फाइबर, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं। कई जगहों पर जितिया के पारण के भोजन में इसका इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, करीब 24 घंटे के निर्जला व्रत के बाद इसे बहुत ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय थोड़ी मात्रा से शुरुआत करना बेहतर रहेगा।
देसी मटर या कुशी केराव
जितिया के पारंपरिक भोजन में देसी मटर, जिसे कुछ क्षेत्रों में कुशी केराव कहा जाता है, का भी उल्लेख मिलता है। यह फसल अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों में भी उगाई जा सकती है। इसी वजह से लोक परंपराओं में इसे मजबूती और मुश्किल समय से जूझने की क्षमता से जोड़कर देखा जाता है। पोषण की दृष्टि से इसमें प्रोटीन समेत कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं।
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पारण करते समय इन बातों का रखें ख्याल
निर्जला उपवास के बाद शरीर को भोजन की आदत दोबारा डालने में थोड़ा समय लग सकता है। इसलिए पारण के तुरंत बाद पेट भरकर खाना या बहुत तला-भुना भोजन लेना सही नहीं माना जाता। शुरुआत हल्के और आसानी से पचने वाले भोजन से करें। खाने में तेल, मिर्च और मसालों की मात्रा सीमित रखें। साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी या तरल पदार्थ लेकर शरीर में पानी की कमी को पूरा करना भी जरूरी है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।