जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) ने देर रात हुई नारेबाजी की घटना की निंदा की है और कहा है कि छात्रों पर कार्रवाई की जाएगी। JNU प्रशासन ने एक बयान में कहा है कि विश्वविद्यालय को नफरत की प्रयोगशाला बनने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
छात्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई
JNU के रजिस्ट्रार रवीकेश ने कहा है कि नारेबाजी करने वाले छात्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, जिसमें निलंबन, विश्वविद्यालय से बाहर निकालना और भविष्य में प्रवेश से वंचित करना शामिल है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में शांति और सौहार्द बनाए रखना आवश्यक है।
गलत तरीके से पेश किया जा रहा
JNU स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि नारेबाजी की घटना को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और विश्वविद्यालय को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। JNUSU ने कहा है कि छात्रों के पास अपनी बात रखने का अधिकार है और उन्हें दबाया नहीं जा सकता।
प्रशासन ने "अभद्र और भड़काऊ" कहा
JNU में हुई नारेबाजी की घटना के पीछे का कारण 5 जनवरी 2020 को हुए हमले की छठी वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारे लगाए, जिसे JNU प्रशासन ने "अभद्र और भड़काऊ" कहा।
JNU स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) ने इस कार्यक्रम को "राइट ऑफ रेसिस्टेंस विद गेरिल्ला ढाबा" नाम दिया था, जिसका उद्देश्य 2020 के हमले के खिलाफ आवाज उठाना और विश्वविद्यालय में शांति और सौहार्द बनाए रखना था।
35 छात्रों को जिम्मेदार ठहराया
JNU प्रशासन ने इस घटना के लिए 35 छात्रों को जिम्मेदार ठहराया है, जिनमें JNUSU अध्यक्ष अदिति मिश्रा भी शामिल हैं। प्रशासन ने इन छात्रों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी है, जिसमें निलंबन, विश्वविद्यालय से बाहर निकालना और भविष्य में प्रवेश से वंचित करना शामिल है।