भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनकी मान्यताएं और स्वरूप बेहद रहस्यमयी और अद्भुत हैं। ऐसा ही एक शक्तिपीठ है Jogulamba Temple, जहां देवी मां का स्वरूप आम मंदिरों से बिल्कुल अलग और चौंकाने वाला है। यहां माता के सिर पर बिच्छू, मेंढक और छिपकली विराजमान हैं और वे शव पर बैठी हुई दिखाई देती हैं। यह मंदिर तंत्र साधना और गूढ़ शक्तियों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
दक्षिण काशी में स्थित है पवित्र शक्तिपीठ
तेलंगाना के Alampur में स्थित यह मंदिर तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के संगम पर बसा हुआ है। इस क्षेत्र को “दक्षिण काशी” और “नवब्रह्मेश्वर तीर्थ” के नाम से भी जाना जाता है। यहां कई प्राचीन मंदिर मौजूद हैं, लेकिन जोगुलम्बा मंदिर की विशेष पहचान इसकी रहस्यमयी मान्यताओं और शक्तिपीठ होने के कारण है।
मां जोगुलम्बा का उग्र और तांत्रिक स्वरूप
इस मंदिर में विराजित मां जोगुलम्बा को उग्र रूप में पूजा जाता है। उनके सिर पर बिच्छू, मेंढक और छिपकली का होना तांत्रिक ऊर्जा और रहस्यमयी शक्तियों का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि यहां विशेष रूप से तंत्र और योग साधना करने वाले साधक आते हैं। देवी का यह स्वरूप भक्तों में श्रद्धा के साथ-साथ रहस्य और आस्था का भाव भी जगाता है।
शव पर विराजमान देवी की अनोखी प्रतिमा
मां जोगुलम्बा की सबसे खास बात यह है कि वे एक शव पर विराजमान हैं। यह प्रतीक मृत्यु पर विजय और जीवन के रहस्यों पर नियंत्रण को दर्शाता है। तांत्रिक परंपराओं में इसे शक्ति और साधना की उच्च अवस्था का संकेत माना जाता है। यही वजह है कि यह मंदिर साधकों के लिए बेहद खास माना जाता है।
शक्ति पीठ से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब Sati ने अपने पिता के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह कर लिया, तब Shiva उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे। तब Vishnu ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए। माना जाता है कि यहां देवी के ऊपरी दांत गिरे थे, जिससे यह स्थान शक्तिपीठ बना।
‘योगुला अम्मा’ नाम का आध्यात्मिक अर्थ
“जोगुलम्बा” नाम तेलुगु शब्द “योगुला अम्मा” से निकला है, जिसका अर्थ है “योगियों की मां”। यह नाम देवी के उस स्वरूप को दर्शाता है, जो साधना, तप और आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है। इस मंदिर में शिव जी की आराधना Bal Brahmeshwara Swamy Temple के रूप में भी की जाती है, जो इस तीर्थ को और भी विशेष बनाता है।