
कैश कांड मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी थी. इस समिति ने जस्टिस वर्मा को मामले में संदिग्ध पाते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की थी.
क्या है मामला?
यह मामला कथित रूप से एक कैश फॉर जजमेंट स्कैम से जुड़ा है, जिसमें आरोप है कि एक पक्ष विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए पैसों का लेनदेन हुआ. सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक जांच समिति ने इस मामले की गहन जांच की और अपनी रिपोर्ट में कहा कि जस्टिस वर्मा की भूमिका संदिग्ध है और उनके आचरण पर सवाल खड़े होते हैं. इसी रिपोर्ट को जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
ये भी पढ़ें : PM Kisan Yojana Installment: PM किसान योजना की किस्त नहीं आई? जानिए कारण और समाधान
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि जांच समिति द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई भी ऐसा उल्लंघन नहीं हुआ है जिससे याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकार प्रभावित हुए हों. पीठ ने यह भी कहा कि समिति ने नियमों और प्रक्रिया का पालन पूरी सावधानी से किया है. कोर्ट ने यह भी माना कि समिति द्वारा फोटो और वीडियो साक्ष्य अपलोड नहीं किए गए थे, लेकिन इसे कोई गंभीर खामी नहीं माना गया क्योंकि इस पर उस समय कोई आपत्ति नहीं जताई गई थी. इसलिए इसका अब कोई प्रभाव नहीं है.
एफआईआर की मांग भी खारिज
इस मामले में एक अलग याचिका दाखिल कर जस्टिस वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका को भी खारिज कर दिया. कोर्ट ने साफ किया कि इस स्तर पर किसी आपराधिक कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है.
इस फैसले के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के लिए कानूनी और नैतिक रूप से मुश्किलें बढ़ गई हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को न्यायपालिका की स्वायत्तता और अनुशासन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. अब यह देखना होगा कि इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की क्या कार्रवाई की जाती है.