
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इन-हाउस जांच समिति की प्रक्रिया और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) की महाभियोग सिफारिश को असंवैधानिक ठहराया। उन्होंने कहा कि CJI को ऐसा अधिकार नहीं है और इस तरह की सिफारिशें संसद के विशेषाधिकार में हस्तक्षेप करती हैं। इस पर न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि "CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं है", उनकी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी है।
इन-हाउस जांच पर उठे सवाल
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि इन-हाउस जांच समिति केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो न्यायिक मानकों और सबूतों पर आधारित नहीं होती। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के आधार पर महाभियोग जैसी गंभीर सिफारिश करना संविधान के अनुच्छेद 124 और जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 की अनदेखी है।
CJI की भूमिका पर बेंच की टिप्पणी
न्यायमूर्ति दत्ता ने सिब्बल की दलीलों पर जवाब देते हुए कहा कि CJI राष्ट्र के प्रति जवाबदेह हैं और यदि उनके पास गंभीर सामग्री है, तो वे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सिफारिश भेज सकते हैं। उन्होंने कहा कि CJI केवल दस्तावेज़ ट्रांसफर करने वाले नहीं हैं, उनकी भूमिका गहन और निर्णायक है।
आग और नकदी का मामला बना जड़
मार्च 2025 में जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित आवास पर आग लगने की घटना के दौरान कथित रूप से जले हुए नकदी के बंडल मिले थे। इसी मामले की जांच के लिए CJI ने तीन सदस्यीय इन-हाउस समिति बनाई, जिसने रिपोर्ट में वर्मा पर प्रतिकूल टिप्पणी की। इसी के आधार पर महाभियोग की सिफारिश की गई।