मध्य प्रदेश के नीमच जिले के रानपुर गांव में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल की वीरता ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। मधुमक्खियों के अचानक हुए हमले में उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना 20 मासूम बच्चों को बचाया और खुद हजारों डंक सह गईं। इस दर्दनाक हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने परिवार के लिए आर्थिक सहायता और बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा लेने का ऐलान किया है।
मधुमक्खियों के बीच बनी मानव ढाल
सोमवार को आंगनवाड़ी केंद्र में रोज़ की तरह बच्चों की चहचहाहट गूंज रही थी, तभी पास के पेड़ से मधुमक्खियों के झुंड ने अचानक हमला कर दिया। अफरा-तफरी मच गई, लोग इधर-उधर भागने लगे, लेकिन कंचन बाई पीछे नहीं हटीं। उन्होंने पास पड़ी तिरपाल और अपनी साड़ी से बच्चों को ढंक लिया और खुद आगे खड़ी हो गईं। हजारों डंक उनके शरीर में धंसते चले गए, लेकिन जब तक बच्चे सुरक्षित स्थान तक नहीं पहुंच गए, उन्होंने हार नहीं मानी।
परिवार की हालत और गांव का दर्द
इस बलिदान से कंचन बाई का परिवार गहरे संकट में आ गया है। पति शिवलाल लकवे से पीड़ित हैं और तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी अब परिवार पर आ पड़ी है। गांव में शोक का माहौल है और लोग इस साहसिक कदम को सलाम कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कंचन बाई ने मातृत्व और कर्तव्य का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसे पीढ़ियां याद रखेंगी।
मुख्यमंत्री की घोषणा से राहत की उम्मीद
घटना पर संज्ञान लेते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कंचन बाई के परिवार को चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही उनके बच्चों की पूरी पढ़ाई का खर्च सरकार उठाएगी। मुख्यमंत्री ने इसे अत्यंत दुखद और हृदयविदारक घटना बताते हुए परिवार के प्रति संवेदना जताई है। गांव वालों को उम्मीद है कि इससे बेसहारा परिवार को कुछ सहारा मिलेगा।
प्रशासनिक बयान से बढ़ा विवाद
जहां जनप्रतिनिधि कंचन बाई की बहादुरी को नमन कर रहे हैं, वहीं जिला प्रशासन के एक बयान ने विवाद खड़ा कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि उनकी मौत बच्चों को बचाने के दौरान नहीं हुई, जबकि प्रत्यक्षदर्शी और ग्रामीण कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। इस विरोधाभास ने क्षेत्र में नाराजगी बढ़ा दी है और लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सच्चाई को दबाया जा रहा है।
राजकीय सम्मान और जांच की मांग
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने कंचन बाई को मरणोपरांत राजकीय सम्मान देने की मांग की है। साथ ही पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की अपील की जा रही है, ताकि घटना के हर पहलू पर स्पष्टता आ सके। लोगों का कहना है कि जिसने 20 बच्चों की जान बचाने के लिए खुद को कुर्बान कर दिया, उसे केवल मुआवजे नहीं, बल्कि सम्मान और न्याय भी मिलना चाहिए।