कानपुर के पूर्व मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) डॉ. हरिदत्त नेमी के निलंबन ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है. समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज यादव ने इस मामले में तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में "ठाकुरराज" हावी है. उन्होंने आरोप लगाया कि कानपुर के जिलाधिकारी ठाकुर जाति से हैं, इसलिए उन्हें बचाया गया और दलित अधिकारी को बलि का बकरा बना दिया गया.
पूर्व CMO का दावा: मीटिंग में थप्पड़ मारा, गालियां दीं
डॉ. हरिदत्त नेमी ने निलंबन के कुछ घंटों बाद ही प्रेस वार्ता कर डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि मीटिंग के दौरान डीएम ने उन्हें जाति सूचक गालियां दीं और सिर पर थप्पड़ भी मारा. डॉ. नेमी ने दावा किया कि वह लगातार मानसिक दबाव में काम कर रहे थे और उन्हें योजनाबद्ध तरीके से फंसाया गया.
भ्रष्टाचार रोकने की कीमत: “पेमेंट रोका तो साजिश रची गई”
पूर्व CMO ने बताया कि उन्होंने सीबीआई से चार्जशीटेड व्यक्ति राजेश शुक्ल का पेमेंट रोक दिया था, क्योंकि संबंधित बैच में गड़बड़ी थी. इसका विवरण उन्होंने चिट्ठी के जरिए डीएम को भी दिया. बावजूद इसके, डीएम और SFO वंदना सिंह उन पर दबाव बनाते रहे कि शुक्ल को भुगतान किया जाए. डॉ. नेमी का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी कार्रवाई ही उनके निलंबन की वजह बनी.
जातिगत भेदभाव का आरोप: अनुसूचित जाति से होने की वजह से निशाना
डॉ. हरिदत्त नेमी ने स्पष्ट कहा कि वह अनुसूचित जाति से आते हैं और यही उनकी सबसे बड़ी ‘गलती’ बन गई. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा उन्हें जातिसूचक शब्द कहे गए और सिस्टम में घुसने का दबाव बनाया गया. उन्होंने इन घटनाओं की शिकायत प्रमुख सचिव को मेल और व्हाट्सएप के जरिए की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई. यह मामला अब महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया है. इसमें सियासत, जातिवाद और नौकरशाही की धुंध गहराती जा रही है. निलंबन की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करना अब बेहद ज़रूरी हो गया है.