Kanwar Yatra 2026: सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान देशभर से लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं और हरिद्वार समेत अन्य पवित्र स्थानों से गंगाजल लेकर आते हैं। इस साल कांवड़ यात्रा 30 जुलाई 2026 से शुरू होगी और 11 अगस्त 2026 तक चलेगी। सावन शिवरात्रि के दिन कांवड़िए भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धा के साथ-साथ कुछ नियमों का पालन करना भी जरूरी माना जाता है। अगर आप पहली बार कांवड़ यात्रा पर जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो इससे जुड़े नियमों और मान्यताओं को जानना बेहद जरूरी है।
गंगाजल से भरी कांवड़ की पवित्रता का रखें ध्यान
कांवड़ यात्रा में सबसे ज्यादा महत्व गंगाजल की पवित्रता का होता है। मान्यता है कि कांवड़ में रखा गंगाजल कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। अगर यात्रा के दौरान आराम करना हो या किसी जरूरी काम से रुकना पड़े तो कांवड़ को किसी ऊंचे स्थान, स्टैंड या पेड़ के सहारे रखना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जमीन से स्पर्श होने पर कांवड़ की पवित्रता प्रभावित मानी जाती है।
खान-पान और नशे से बनाएं दूरी
कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को सात्विक जीवनशैली अपनाने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस दौरान प्याज, लहसुन, मांसाहार, शराब, तंबाकू और अन्य नशीली चीजों से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए। साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन करना भी कांवड़ यात्रा के नियमों में शामिल माना जाता है। शरीर और मन की शुद्धता के साथ की गई यात्रा को अधिक फलदायी माना जाता है।
वस्त्र और व्यवहार से जुड़े नियम
कांवड़ यात्रा के दौरान कई श्रद्धालु भगवा या सफेद रंग के कपड़े पहनते हैं और नंगे पैर यात्रा पूरी करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यात्रा के दौरान बाल और नाखून काटने से भी बचना चाहिए। अगर रास्ते में किसी कारण से अशुद्धि हो जाए तो स्नान या गंगाजल से शुद्धि करने की परंपरा बताई गई है।
कांवड़ यात्रा में रखें अनुशासन और श्रद्धा
कांवड़ियों को पूरे रास्ते भगवान शिव के जयकारे लगाते हुए शांत और संयमित रहने की सलाह दी जाती है। किसी भी व्यक्ति या जीव को नुकसान न पहुंचाएं और अपशब्दों से बचें। यात्रा के दौरान पहचान पत्र और जरूरी दवाइयां साथ रखना भी बेहद जरूरी है।
कांवड़ यात्रा की धार्मिक मान्यता
धार्मिक कथाओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि उन्होंने गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था। वहीं, समुद्र मंथन के समय निकले विष को पीने के बाद शिवजी के शरीर में हुई जलन को शांत करने के लिए रावण द्वारा गंगाजल अर्पित करने की कथा भी प्रचलित है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भक्त सावन में कांवड़ यात्रा करते हैं।