kanvad yatra 2025 : सावन का महीना आते ही शिवभक्तों की भक्ति चरम पर होती है, और कांवर यात्रा इस भक्ति का सबसे कठिन और पवित्र रूप मानी जाती है। हर साल लाखों श्रद्धालु जल लेकर गंगाघाटों से अपने क्षेत्र के शिवालयों तक पैदल यात्रा करते हैं। लेकिन इस यात्रा के नियम इतने सख्त होते हैं कि पहली बार सुनकर रूह कांप सकती है। कांवर यात्रा का सबसे पहला और जरूरी नियम है पवित्रता। कांवरिये को यात्रा के पूरे समय ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। उन्हें मांस, मदिरा, प्याज-लहसुन जैसे तामसिक भोजन से दूर रहना पड़ता है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु जमीन पर नहीं सोते — वे या तो टेंट में रहते हैं या खुले आसमान के नीचे चादर बिछाकर सोते हैं।
जानें महत्वपूर्ण नियम
दूसरा बड़ा नियम है कांवर को धरती पर नहीं रखना। कांवर में रखा गया गंगाजल बेहद पवित्र माना जाता है, और उसे यात्रा के दौरान कभी भी ज़मीन पर नहीं रखा जा सकता। इसके लिए कांवरिये विश्राम के समय कांवर को लकड़ी के स्टैंड या साथी कांवरियों की मदद से संभालते हैं। तीसरा नियम है नंगे पाँव चलना। कांवर यात्रा में किसी भी प्रकार के जूते-चप्पल पहनने की अनुमति नहीं होती। चाहे रास्ता धूप से तप रहा हो या कांटे-पत्थरों से भरा हो, कांवरिये नंगे पाँव ही चलते हैं। इसके अलावा यात्रा के दौरान मारपीट, गाली-गलौज या किसी प्रकार की हिंसा सख्त मना होती है। कई कांवरिए तो यात्रा के पहले व्रत और उपवास भी रखते हैं ताकि वे पूरी तरह शुद्ध होकर भगवान शिव की सेवा कर सकें।
मानसिक रूप से भी होती है परीक्षा
यह यात्रा न केवल शारीरिक रूप से कठिन होती है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन की भी परीक्षा होती है। कांवर यात्रा वास्तव में श्रद्धा, तपस्या और संयम का अद्भुत उदाहरण है ..हालांकि कुछ लोगों ने अब कांवड यात्रा को पिकनिक स्पॅाट मानना शुरू कर दिया है. सूत्रों का दावा है कि लगभग 30 प्रतिशत कांवडिये आस्था के लिए हरिद्वार नहीं जाते हैं. बल्कि घूमने के उद्देश्य से भी जाते हैं. हालांकि आर्टिकल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर लिखा गया है. इसलिए लोकसत्य इसकी पुष्टि नहीं करता है.