Kanya Sankranti 2026: हिंदू धर्म में सूर्य को ऊर्जा, आत्मविश्वास और जीवन शक्ति का आधार माना गया है। जब सूर्य एक राशि को छोड़कर अगली राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन को संक्रांति कहा जाता है। सितंबर में सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करने वाले हैं, इसलिए इस अवसर को कन्या संक्रांति के नाम से जाना जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संक्रांति के दिन स्नान, दान और सूर्य उपासना का विशेष महत्व होता है। इस बार कन्या संक्रांति 17 सितंबर 2026 को पड़ रही है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन सूर्य से संबंधित उपाय करने से आत्मविश्वास बढ़ाने और कामकाज में आ रही परेशानियों को कम करने में मदद मिल सकती है।
17 सितंबर को कन्या राशि में प्रवेश करेंगे
सूर्य पंचांग के अनुसार सूर्य देव 17 सितंबर की सुबह 7 बजकर 58 मिनट पर कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। इसी समय संक्रांति का क्षण माना जाएगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग बनने की भी बात कही जा रही है। धार्मिक मान्यताओं में ऐसे योगों को पूजा, दान और धार्मिक कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है।
इस समय करें स्नान और दान
कन्या संक्रांति के दिन महापुण्य काल सुबह 7:58 बजे से 10:01 बजे तक रहेगा। इस दौरान स्नान, दान और सूर्य पूजा की जा सकती है। अगर इस अवधि में यह कार्य संभव न हो तो सुबह 7:58 बजे से दोपहर 2:31 बजे तक पुण्य काल में भी स्नान-दान करने की परंपरा है।
सूर्य देव को इस तरह दें अर्घ्य
सुबह स्नान के बाद तांबे के पात्र में स्वच्छ जल लें। इसमें लाल फूल, लाल चंदन और थोड़ा गुड़ मिलाकर सूर्य देव को अर्पित करें। इस दौरान सूर्य मंत्र का जाप किया जा सकता है। इसके बाद आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ और सूर्य देव की आरती करने की भी परंपरा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार नियमित सूर्य उपासना आत्मविश्वास और कार्यक्षमता से जुड़ी मानी जाती है।
इन चीजों का करें दान
कन्या संक्रांति पर जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार गुड़, गेहूं, लाल वस्त्र, लाल फूल, लाल चंदन या तांबे के बर्तन दान किए जा सकते हैं। मान्यता है कि सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान करने से सूर्य दोष से जुड़ी परेशानियों में राहत मिल सकती है।
मंत्र जाप के साथ लें बड़ों का आशीर्वाद
इस दिन लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से 'ॐ घृणिः सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करने की परंपरा है। माता-पिता और घर के बुजुर्गों का सम्मान कर उनका आशीर्वाद लेना भी शुभ माना जाता है। जिन लोगों के माता-पिता जीवित नहीं हैं, वे पितरों के निमित्त जल अर्पित कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन की बाधाएं कम हो सकती हैं।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।