कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच सत्ता-साझेदारी की खींचतान नए मोड़ पर पहुंच गई है। आलाकमान के निर्देश पर दोनों नेता शनिवार सुबह नाश्ते पर मिलेंगे, ताकि जारी विवाद का समाधान निकाला जा सके। इसी बीच शिवकुमार के ‘त्याग’ वाले बयान ने राजनीति में हलचल मचा दी है। क्या वह खुद त्याग की बात कर रहे हैं या सिद्धारमैया को संकेत दे रहे हैं—इस पर राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा हो रही है।
नाश्ते की बैठक से समाधान की कोशिश
सत्ता बंटवारे के मुद्दे पर लगातार बढ़ रही खींचतान के बीच सिद्धारमैया ने अपने उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को शनिवार सुबह 9 बजे नाश्ते पर बुलाया है। उनका कहना है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने दोनों नेताओं से बातचीत करने और समाधान खोजने को कहा है। सिद्धारमैया का साफ कहना है कि वे आलाकमान के निर्देश का पालन करेंगे और बैठक में सभी विषयों पर खुलकर चर्चा की जाएगी।
शिवकुमार का ‘त्याग’ वाला बयान और राजनीतिक संकेत
शिवकुमार ने सोशल मीडिया पर रहस्यमय संदेश के बाद शुक्रवार को त्याग की बात कही। उन्होंने 2004 में सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद का दावा छोड़ने का उदाहरण देते हुए कहा कि बड़ा नेता वही होता है जो पार्टी और प्रदेश के लिए त्याग कर सके। इस बयान ने सवाल खड़े किए कि क्या वह खुद पीछे हटने की बात कर रहे हैं या सिद्धारमैया की ओर इशारा है कि उन्हें रास्ता देना चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर कयासों का दौर जारी है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी
पूर्व मुख्यमंत्री एम. वीरप्पा मोइली ने दोनों नेताओं के बीच चल रही तनातनी को ‘अराजकता’ बताते हुए कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह विवाद पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है और आलाकमान को पहले ही हस्तक्षेप कर देना चाहिए था। मोइली ने चेतावनी दी कि अगर स्थिति नियंत्रण में नहीं आई तो पार्टी को राज्य में अपनी सरकार बचाने तक की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
संतों
का समर्थन और बढ़ती राजनीतिक
हलचल
स्थिति और दिलचस्प हो गई जब वोक्कालिगा समुदाय के दो प्रमुख संतों ने शिवकुमार से मुलाकात कर उन्हें समर्थन दिया। इससे राजनीतिक समीकरणों में नई चर्चा शुरू हो गई कि क्या समुदाय का दबाव भी नेतृत्व विवाद को प्रभावित करेगा।
अब सबकी नजरें शनिवार की नाश्ते वाली बैठक पर हैं, जहां इस राजनीतिक संघर्ष का कोई स्पष्ट रास्ता निकल सकता है।