डिजिटल दौर में निजी जानकारी और व्यक्तिगत सामग्री की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए कर्नाटक सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि बिना अनुमति किसी व्यक्ति की निजी फोटो या वीडियो साझा करने या वायरल करने के मामलों में पुलिस को अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करनी होगी। इस फैसले का उद्देश्य डिजिटल सुरक्षा और पीड़ितों को त्वरित संरक्षण देना है।
निजी सामग्री साझा करना माना जाएगा अलग अपराध
सरकार ने अपने दिशा-निर्देशों में साफ किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने फोटो या वीडियो रिकॉर्ड करने की सहमति दी है, तो इसका अर्थ यह नहीं माना जाएगा कि उस सामग्री को सार्वजनिक करने या आगे साझा करने की भी अनुमति मिल गई है। बिना सहमति निजी सामग्री प्रसारित करना अलग अपराध की श्रेणी में आएगा।
इन कानूनी प्रावधानों के तहत होगी कार्रवाई
नई व्यवस्था के तहत ऐसे मामलों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की संबंधित धाराओं के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। जांच के दौरान पुलिस मामले की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर लागू धाराएं जोड़ सकेगी।
शिकायत लेने में देरी नहीं करने के निर्देश
सरकार ने स्पष्ट किया है कि रिकॉर्डिंग के लिए पहले दी गई सहमति को शिकायत दर्ज न करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति निजी सामग्री का उपयोग ब्लैकमेल, धमकी या दबाव बनाने के लिए करता है तो संबंधित अतिरिक्त आपराधिक धाराएं भी लगाई जाएंगी।
जीरो एफआईआर और डिजिटल साक्ष्यों पर जोर
यदि घटना का क्षेत्र स्पष्ट नहीं है, तो संबंधित पुलिस थाने को जीरो एफआईआर दर्ज करनी होगी। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने और तकनीकी सहायता के लिए साइबर इकाइयों के साथ समन्वय के निर्देश दिए गए हैं।
पीड़ित की पहचान गोपनीय रखने पर विशेष जोर
निर्देशों में यह भी कहा गया है कि शिकायतकर्ता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाए और उसके साथ संवेदनशीलता से व्यवहार किया जाए। किसी भी प्रकार की पीड़ित को दोष देने वाली मानसिकता से बचने और शिकायत प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया गया है।