
कार्तिक पूर्णिमा 2025 का दिन हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ और पावन माना जाता है। यह तिथि हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को आती है और इस बार यह पर्व 14 नवंबर 2025, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है, क्योंकि इसी तिथि को उन्होंने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध कर ब्रह्मांड को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया था। तभी से शिवजी को ‘त्रिपुरारी’ के नाम से जाना जाने लगा। आइए जानते हैं इस पवित्र दिन से जुड़ी रोचक कथा और इसका आध्यात्मिक महत्व।
भगवान शिव और त्रिपुरासुर की कथा
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार तारकासुर नामक दैत्य का वध भगवान कार्तिकेय ने किया। तारकासुर के तीन पुत्र—विद्युन्माली, तारकेष और कमलाक्ष—अपने पिता की मृत्यु से क्रोधित होकर ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करने लगे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वरदान दिया कि वे तीन नगरों—स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल—में रहने वाले होंगे, और ये नगर एक विशेष समय पर एक सीध में आएंगे। तभी कोई उन्हें नष्ट कर सकेगा। इन तीनों नगरों को मिलाकर उन्हें त्रिपुर कहा गया, और इन राक्षसों को त्रिपुरासुर के नाम से जाना गया। वरदान पाकर वे अत्याचारी बन गए और देवताओं तक को परेशान करने लगे। उनकी शक्ति से घबराए सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
भगवान शिव बने त्रिपुरारी
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने अपने दिव्य धनुष ‘पिनाक’ और अग्निबाण से एक ही क्षण में उन तीनों नगरों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार त्रिपुरासुरों का अंत हुआ और सृष्टि में फिर से शांति स्थापित हुई। इस विजय दिवस को ही कार्तिक पूर्णिमा कहा गया और भगवान शिव को मिला नया नाम — त्रिपुरारी, अर्थात त्रिपुरासुर का संहार करने वाला।
कार्तिक पूर्णिमा का धार्मिक महत्व
इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ-साथ गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। कहा जाता है कि इस दिन किया गया दान अक्षय फल प्रदान करता है और व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली के रूप में भी मनाया जाता है।