ईरान और इजरायल के बीच चल रहे युद्ध के बीच भारत सरकार ने ‘ऑपरेशन सिंधू’ चलाकर ईरान में फंसे भारतीय छात्रों को सुरक्षित वापस लाया। इन छात्रों में सबसे अधिक संख्या कश्मीर से थी। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कश्मीर के छात्र बड़ी संख्या में मेडिकल की पढ़ाई के लिए ईरान ही क्यों चुनते हैं।
मेडिकल सीटें भारत में बढ़ीं, फिर भी नहीं थमा विदेश का रुख
भारत में मेडिकल सीटें भले ही 1 लाख से ऊपर हो गई हैं, लेकिन प्रतियोगिता इतनी अधिक है कि कई छात्रों को बाहर पढ़ाई का विकल्प चुनना पड़ता है। 2024 में NEET-UG में 22.7 लाख छात्रों ने भाग लिया, लेकिन सरकारी सीटें सिर्फ़ आधी हैं। निजी कॉलेजों की फीस करोड़ों में होने के कारण सस्ता विकल्प तलाशने वाले छात्र ईरान जैसे देशों का रुख करते हैं, जहां उन्हें एक अच्छी डिग्री किफायती दरों पर मिलती है।
FMGE आंकड़े बताते हैं विदेश में पढ़ाई की सच्चाई
2024 में FMGE (Foreign Medical Graduate Exam) के लिए 79,000 छात्रों ने आवेदन किया, जो कि पिछले वर्षों से कहीं ज्यादा है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में छात्र अब भी विदेश से मेडिकल की डिग्री लेकर भारत लौट रहे हैं। ईरान में 2022 में 2,050 से ज्यादा भारतीय छात्रों ने दाखिला लिया था, जिनमें से ज़्यादातर मेडिकल स्ट्रीम से थे।
कश्मीर और ईरान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते
कश्मीर के छात्रों का ईरान की तरफ रुझान सिर्फ आर्थिक कारणों से नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव भी इसकी बड़ी वजह है। JNU के प्रो. सैयद अख्तर हुसैन बताते हैं कि कश्मीर को ऐतिहासिक रूप से “ईरान-ए-सगीर” यानी छोटा ईरान कहा जाता रहा है। कश्मीर की संस्कृति, धर्म और भाषा पर ईरानी प्रभाव गहरा है, जिससे छात्रों को वहां पढ़ाई में सहजता मिलती है।
युद्ध के समय फिर उजागर हुई मेडिकल एजुकेशन की विदेश निर्भरता
यह पहली बार नहीं है जब युद्ध ने विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की स्थिति उजागर की हो। 2022 में ऑपरेशन गंगा के तहत भारत सरकार ने यूक्रेन से हजारों मेडिकल छात्रों को निकाला था। अब ऑपरेशन सिंधू ने फिर यह सोचने पर मजबूर किया है कि क्यों भारतीय छात्र खासकर मेडिकल की पढ़ाई के लिए जोखिम भरे देशों का भी रुख करते हैं।