आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि उसके 10 में से 7 राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। राघव चड्ढा की अगुवाई में हुई इस बगावत को पार्टी के लिए बड़ा सियासी संकट माना जा रहा है। इन सांसदों को राज्यसभा में BJP के तौर पर मान्यता भी मिल चुकी है, जिससे AAP की ताकत कमजोर हुई है।
केजरीवाल के करीबी ही हुए अलग
इस बगावत में स्वाति मालीवाल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता जैसे नाम शामिल हैं। ये सभी नेता अरविंद केजरीवाल के बेहद करीबी माने जाते थे और पार्टी की रणनीति व संगठन में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। यही वजह है कि इस घटनाक्रम को AAP के अंदरूनी संकट के रूप में देखा जा रहा है।
पहले भी टूट झेल चुकी है पार्टी
AAP के लिए यह पहला झटका नहीं है। इससे पहले भी योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, किरण बेदी और शाजिया इल्मी जैसे बड़े चेहरे पार्टी से अलग हो चुके हैं। लेकिन इस बार मामला ज्यादा गंभीर इसलिए है क्योंकि बगावत करने वाले नेता पार्टी के कोर ग्रुप का हिस्सा रहे हैं।
BJP को फायदा, पर सीमित असर
इस घटनाक्रम से भारतीय जनता पार्टी को राज्यसभा में संख्या बल बढ़ाने का फायदा मिला है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नेताओं का जनाधार सीमित है, इसलिए जमीन पर इसका असर कितना होगा, यह साफ नहीं है। खासकर पंजाब जैसे राज्यों में BJP के लिए यह चुनौती बनी रहेगी।
कांग्रेस के लिए खुला मौका
इस पूरे घटनाक्रम से सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। AAP की राजनीति कांग्रेस के विरोध से शुरू हुई थी और अब उसकी कमजोरी कांग्रेस के लिए अवसर बन सकती है। दिल्ली, पंजाब, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में कांग्रेस अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर सकती है।
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आने वाले चुनावों पर असर
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में इस बगावत का असर साफ दिख सकता है। AAP के कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर सकता है, जबकि कांग्रेस इसे अपने पक्ष में भुना सकती है। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में नए समीकरण बनाने की ओर इशारा कर रहा है।