Makar Sankranti: सनातन परंपरा में मकर संक्रांति पर्व का विशेष महत्व है। इसकी पूर्णता के साथ ही सभी शुभ काम शुरू हो जाते हैं। मकर संक्रांति का धार्मिक और सामाजिक महत्व तो है ही, इसका खगोलीय महत्व भी है। संक्रांति पर ग्रहों की स्थिति, सूर्य का उत्तरायण होना और आकाशीय पिंडों की गतिविधियां संक्रांति को खगोल विज्ञान में शोध का कारक बनाती हैं।
दिन-रात पूरी पृथ्वी पर एक जैसा नहीं होता
गोरखपुर के वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारतीय संस्कृति, पर्व और त्योहारों में खगोलीय विज्ञान सम्मिलित रहता है। यह आकाशीय पिंडों की गतिविधियों और पृथ्वी पर उनके प्रभाव को दर्शाता है। पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना ही दिन और रात का कारण है. हालांकि यह दिन-रात पूरी पृथ्वी पर एक जैसा नहीं होता। सूर्य की जितनी रोशनी पृथ्वी के जितने भाग पर पड़ती है, उससे दिन-रात की अवधि तय होती है। पृथ्वी का अपने अक्ष पर 23.5 अंश झुकी है। इससे दोनो गोलार्ध में मौसम भी अलग-अलग होता है।
सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन होना खगोलीय घटना
खगोलविद ने बताया कि सूर्य का उत्तरायण और दक्षिणायन होना खगोलीय घटना है। प्राचीन खगोलीय गणनाओं के हिसाब से 14/15 जनवरी के बाद सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसे उत्तरायण कहा जाता है। संक्रांति पर सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करते हैं। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिकता के आधार पर इस घटना के पीछे का मुख्य कारण है पृथ्वी का छह महीने की समयावधि के बाद उत्तर से दक्षिण की ओर भ्रमण करना। यह प्राकृतिक खगोलीय प्रक्रिया है। जो लोग उत्तरी गोलार्ध में रहते हैं, उनके लिए सूर्य की इस राशि परिवर्तन के कारण 14/15 जनवरी का दिन मकर संक्रांति के तौर पर मनाते हैं। उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वालों द्वारा ही समय के साथ धीरे-धीरे मकर मंडल के आधार पर ही मकर संक्रांति की संज्ञा अस्तित्व में आई है।
मकर संक्रांति का अर्थ क्या है
खगोलविद ने बताया कि मकर संक्रांति का अर्थ सूर्य का क्रांति वृत्त के दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचना. प्राचीन काल से सूर्य मकर मंडल में प्रवेश करके जब क्रांति वृत्त के सबसे दक्षिणी छोर से इस दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु पर पहुंचता है, तब वह दिन ( 21 या 22 दिसंबर) सबसे छोटा होता है। उन्होंने बताया कि आधुनिक गणितीय खगोलीय गणनाओं के हिसाब से देखा जाए तो पाते हैं कि अब सूर्य जनवरी के मध्य में मकर मंडल में प्रवेश करता है. वजह यह है कि अयन चलन के कारण दक्षिणायनांत (या उत्तरायनारंभ) बिंदु अब पश्चिम की ओर के धनु मंडल में सरक गया है।
मकर मंडल से कोई लेना देना नहीं रह गया
अब वास्तविक मकर संक्रांति (दक्षिणायनांत या उत्तरायनारंभ बिंदु) का आकाश के मकर मंडल से कोई लेना देना नहीं रह गया है। मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में संक्रमण का प्रतीक होता है जो सूर्य की उत्तर की ओर यात्रा (उत्तरायण) का संकेत माना गया है। यह परिवर्तन शीतकालीन संक्रांति के बाद होता है, जब उत्तरी गोलार्ध में धीरे धीरे दिन लंबे होने लगते हैं. यह गर्मी और नवीनीकरण की शुरुआत का भी प्रतीक है।
मकर संक्रांति का खगोलीय-सांस्कृतिक समागम
खगोलविद ने बताया कि प्राचीन खगोल विज्ञान के अनुसार, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसे संक्रांति क्षण कहा जाता है। मकर संक्रांति का रियल साइंस यह है कि यह केवल धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की गति और मौसम परिवर्तन से जुड़ा महत्वपूर्ण खगोलीय पड़ाव है। संक्रांति से ही सूर्य के कर्क रेखा की ओर बढ़ने से उत्तरी गोलार्ध में सौर ऊर्जा बढ़ती है। यह जलवायु और कृषि चक्र को प्रभावित करता है।
लोग पारंपरिक रूप से धूप सेंकते हैं
यह प्रक्रिया उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले लोगों में कायाकल्प और जीवन शक्ति को प्रोत्साहित करता है। ऐसा स्पष्ट रूप से महसूस होने लगता है। इस अवधि में लोग पारंपरिक रूप से धूप सेंकते हैं। इससे शरीर को अधिक विटामिन डी का उत्पादन करने में मदद मिलती है।खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि जैसे तिल और गुड़ का सेवन केवल सांस्कृतिक ही नहीं है ,बल्कि यह खाद्य पदार्थ पोषक तत्वों से भी भरपूर होता है। यह ठंड के महीने के दौरान शरीर को गर्म और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करते हैं।