गुरु पूर्णिमा पर जब पूरी दुनिया गुरु-शिष्य परंपरा को नमन करती है, तब उज्जैन की धरती एक ऐतिहासिक गाथा दोहराती है। यह वही नगरी है जहां हजारों वर्ष पहले भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने गुरु सांदीपनि से वेद, शास्त्र और 64 कलाओं की शिक्षा पाई थी। आज भी इस पवित्र स्थान पर गुरुकुल परंपरा जीवित है। यहां के 51 से अधिक गुरुकुलों में परंपरागत वेद शिक्षा दी जाती है, जो उज्जैन को आध्यात्मिक शिक्षा की धरोहर बनाती है।
श्रीकृष्ण ने यहीं सीखी थीं 64 कलाएं
उज्जैन को आध्यात्मिक शिक्षा की भूमि कहा जाता है। यहां स्थित गुरु सांदीपनि आश्रम को विश्व का पहला गुरुकुल माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करीब 5268 वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण 11 वर्ष की उम्र में शिक्षा प्राप्त करने यहां आए थे। उन्होंने बलराम और सुदामा के साथ यहां 64 दिन रहकर वेद, शास्त्र, राजनीति, युद्ध कला और अन्य 64 कलाओं का अध्ययन किया था।
आज भी जीवित है परंपरा
गुरुकुल में अब औपचारिक शिक्षा-दीक्षा नहीं होती, लेकिन परंपरा जीवित है। ऋषि सांदीपनि के वंशज पं. आनंद शंकर व्यास के अनुसार बसंत पंचमी पर अक्षरारंभ संस्कार किया जाता है। वहीं गुरु पूर्णिमा पर विशेष गुरु यात्रा
पूजन और गुरु वंदन जैसे सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। उज्जैन के 51 से अधिक गुरुकुलों में अब भी परंपरागत वेद पाठ, यज्ञ, संस्कार और ज्ञान की विधिवत शिक्षा दी जाती है।
आश्रम आज भी बना है प्रेरणा स्थल
मंगलनाथ रोड स्थित अंकपात क्षेत्र में आज भी सांदीपनि आश्रम मौजूद है। यहां बाल श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा की शिलाएं बनी हैं, जो उन्हें अध्ययनरत मुद्रा में दर्शाती हैं। यह स्थान श्रद्धालुओं और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का केंद्र है, जहां हर वर्ष हजारों लोग आकर गुरु परंपरा का अनुभव करते हैं।