Janmashtami Special: जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और रात में कृष्ण जन्म के समय विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जन्म के बाद बाल गोपाल को भोग लगाने की परंपरा भी निभाई जाती है। लेकिन कृष्ण भक्ति से जुड़ी इस परंपरा का एक ऐसा ऐतिहासिक अध्याय भी है, जिसका संबंध राजस्थान की प्रसिद्ध कृष्ण भक्त मीरा बाई से है। मीरा बाई की कृष्ण के प्रति भक्ति बचपन से ही गहरी थी। कहा जाता है कि उन्होंने बाल्यावस्था में जिस कृष्ण प्रतिमा को अपने आराध्य के रूप में स्वीकार किया था, वह आज भी राजस्थान में मौजूद है। यह प्रतिमा पाली जिले के घाणेराव स्थित एक मंदिर में सुरक्षित बताई जाती है।
'मुरलीधर जी' के नाम से जानी जाती है प्रतिमा
परंपरागत विवरणों और इतिहास से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार, मीरा बाई के पास बचपन में भगवान कृष्ण की एक प्रतिमा थी, जिसे अब मुरलीधर जी के नाम से जाना जाता है। काले संगमरमर से बनी इस प्रतिमा की ऊंचाई करीब 14 इंच बताई जाती है। इस मूर्ति को लगभग पांच शताब्दी पुराना माना जाता है। मीरा बाई के जीवन और उनकी कृष्ण भक्ति से जुड़े होने के कारण यह प्रतिमा धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी खास महत्व रखती है।
शादी के बाद मीरा मूर्ति को चित्तौड़ ले गई थीं
मीरा बाई के जीवन से जुड़ी मान्यताओं के मुताबिक, वर्ष 1516 में विवाह के बाद वह इस कृष्ण प्रतिमा को अपने साथ चित्तौड़गढ़ ले गई थीं। उनके लिए यह सिर्फ पूजा की वस्तु नहीं थी, बल्कि भगवान कृष्ण के प्रति उनकी गहरी आस्था का केंद्र थी। समय के साथ मीरा बाई का झुकाव आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ता गया। बाद में उन्होंने राजघराने का जीवन छोड़ दिया और वृंदावन की ओर प्रस्थान किया। बताया जाता है कि इस दौरान उन्होंने प्रतिमा की जिम्मेदारी अपने चचेरे भाई ठाकुर प्रताप सिंह को सौंप दी थी। बाद में प्रताप सिंह के परिवार के माध्यम से यह प्रतिमा घाणेराव पहुंची और यहीं इसे सुरक्षित रखा गया।
अरावली की तलहटी में बसा है घाणेराव
घाणेराव राजस्थान के पाली जिले में स्थित एक ऐतिहासिक गांव है। अरावली पर्वतमाला की तलहटी में बसे इस इलाके की पहचान यहां मौजूद घाणेराव महल से भी है। महल में राजपूत स्थापत्य की झलक देखने को मिलती है। इसकी वास्तुकला में मेवाड़ और मारवाड़ की शैली का प्रभाव नजर आता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस महल का निर्माण ठाकुर गोपाल दास जी ने वर्ष 1606 में कराया था। समय के साथ इस ऐतिहासिक इमारत को हेरिटेज होटल के रूप में विकसित किया गया। महल परिसर में मीरा बाई से जुड़ी मुरलीधर जी की प्रतिमा भी संरक्षित बताई जाती है।
घाणेराव कैसे पहुंच सकते हैं?
घाणेराव राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थलों के बीच एक सुविधाजनक स्थान पर स्थित है। यह जोधपुर और उदयपुर के बीच पड़ता है। यहां आने वाले पर्यटक रणकपुर जैन मंदिर और कुंभलगढ़ किले की यात्रा को भी अपने कार्यक्रम में शामिल कर सकते हैं। रेल से आने वाले यात्रियों के लिए फालना और मारवाड़ जंक्शन प्रमुख विकल्प हैं। दोनों जगहों से घाणेराव की दूरी करीब 30 से 40 किलोमीटर के आसपास बताई जाती है। रेलवे स्टेशन से टैक्सी या स्थानीय परिवहन के जरिए गांव तक पहुंचा जा सकता है। हवाई मार्ग से आने वालों के लिए उदयपुर एयरपोर्ट एक विकल्प है। यहां से घाणेराव करीब 110 से 120 किलोमीटर दूर पड़ता है। एयरपोर्ट से आगे कैब या बस से सफर किया जा सकता है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।