मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जबलपुर का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण ने इस नगरी में दो बार कदम रखे — पहली बार अपनी बुआ श्रुतश्रुवा से मिलने और दूसरी बार शिशुपाल के पुत्र धृतकेतु को लेने के लिए।
पहली यात्रा: बुआ श्रुतश्रुवा से मिलने पहुंचे श्रीकृष्ण
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जबलपुर की चेदी नगरी में श्रीकृष्ण की बुआ श्रुतश्रुवा का विवाह
चेदिराज दमघोष से हुआ था। श्रुतश्रुवा, वासुदेव की बहन थीं और उनके पुत्र शिशुपाल का जन्म भी चेदी में हुआ था। जब श्रीकृष्ण उज्जैन के सांदीपनि आश्रम से निकले, तो वे पहली बार अपनी बुआ से मिलने जबलपुर पहुंचे।
यह भी कहा जाता है कि शिशुपाल के जन्म के समय उसकी चार भुजाएं थीं। उसे वरदान और श्राप दोनों मिला था कि जो उसे पहली बार देखेगा, उसी के हाथों उसका अंत होगा और दो भुजाएं उसी समय गिर जाएंगी। श्रीकृष्ण के दर्शन होते ही शिशुपाल की दो भुजाएं गिर गईं, और बुआ को यह आभास हो गया कि उसका वध श्रीकृष्ण के हाथों होगा।
श्रीकृष्ण की सहनशीलता और शिशुपाल का अंत
श्रुतश्रुवा ने श्रीकृष्ण से वादा लिया कि वे शिशुपाल को क्षमा करेंगे। श्रीकृष्ण ने शर्त रखी कि वे उसकी 100 गलती तक माफ करेंगे। लेकिन जब युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण को विशेष सम्मान दिया गया, तो शिशुपाल ने उनके खिलाफ अपशब्दों की बौछार कर दी। श्रीकृष्ण ने वचन निभाया, लेकिन जब वह 100 से ज्यादा अपमानजनक बातें कर गया, तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया।
दूसरी यात्रा: शिशुपाल के पुत्र धृतकेतु को लेने आए श्रीकृष्ण
शिशुपाल के पुत्र धृतकेतु को महाभारत के युद्ध में पांडवों की ओर से लड़ना था। पांडवों के सहयोग के लिए श्रीकृष्ण एक बार फिर जबलपुर की चेदी नगरी पहुंचे और धृतकेतु को अपने साथ लेकर गए। यही श्रीकृष्ण की जबलपुर की दूसरी यात्रा मानी जाती है।
जबलपुर और श्रीकृष्ण — एक पौराणिक संबंध
जबलपुर को संस्कारधानी कहा जाता है, और श्रीकृष्ण का इस नगरी से दो बार आना इस शहर की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत को और भी गौरवशाली बना देता है। जन्माष्टमी के अवसर पर यहां श्रद्धालु विशेष उत्साह से भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं।