मध्य प्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट चीता का दायरा और बढ़ने जा रहा है। 28 फरवरी को बोत्सवाना से 8 नए चीते यहां लाए जाएंगे। वायुसेना के हेलिकॉप्टरों के जरिए उनकी विशेष एंट्री होगी। इस हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव के शामिल होने की संभावना है, जिसके चलते प्रशासनिक तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
बोत्सवाना से कूनो तक: अंतरराष्ट्रीय सफर की तैयारियां
प्रोजेक्ट चीता के तहत यह एक और महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, बोत्सवाना से विशेष विमान के जरिए चीतों को पहले ग्वालियर एयरपोर्ट लाया जाएगा। इसके बाद वायुसेना के तीन हेलिकॉप्टरों से उन्हें कूनो नेशनल पार्क तक पहुंचाया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया को वन्यजीव विशेषज्ञों और पशु चिकित्सकों की निगरानी में अंजाम दिया जाएगा, ताकि चीतों को किसी तरह का तनाव न हो।
हेलिकॉप्टर ट्रायल और सुरक्षा व्यवस्था
चीतों के आगमन से पहले वायुसेना के हेलिकॉप्टर की ट्रायल लैंडिंग कराई जाएगी। प्रशासन ने पहले से बने पांच हेलीपेड को दुरुस्त करने के निर्देश दिए हैं। कार्यक्रम स्थल, सुरक्षा घेरा और अतिथियों के आगमन की व्यवस्थाओं की समीक्षा की जा चुकी है। अधिकारियों का कहना है कि चीतों की सुरक्षित लैंडिंग और तत्काल क्वारंटीन बाड़ों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बहु-स्तरीय प्लान तैयार किया गया है।
क्वारंटीन में होगी स्वास्थ्य निगरानी
कूनो पहुंचने के बाद चीतों को सीधे विशेष क्वारंटीन बाड़ों में रखा जाएगा। यहां उनकी स्वास्थ्य जांच, व्यवहारिक अध्ययन और अनुकूलन प्रक्रिया पर विशेषज्ञ नजर रखेंगे। कुछ समय बाद उन्हें बड़े बाड़ों में छोड़ा जाएगा, जहां वे प्राकृतिक वातावरण में खुद को ढाल सकेंगे। यह चरण चीतों के सफल पुनर्वास के लिए बेहद अहम माना जाता है।
पहले भी हो चुका है सफल स्थानांतरण
भारत में चीतों की वापसी की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से 8 चीतों के आगमन से हुई थी। इसके बाद 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते लाए गए। अब बोत्सवाना से आने वाले 8 चीतों के साथ कूनो में कुल संख्या 35 तक पहुंच जाएगी। वर्तमान में यहां 27 चीते मौजूद हैं, जिनमें कुछ शावक भी शामिल हैं।
वन्यजीव संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम
कूनो नेशनल पार्क में चीतों की बढ़ती संख्या भारत में विलुप्त हो चुकी प्रजाति को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। यह परियोजना न केवल जैव विविधता को सशक्त करेगी, बल्कि पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देगी। 28 फरवरी का दिन वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक और अहम पड़ाव के रूप में दर्ज हो सकता है।