श्योपुर स्थित कुनो नेशनल पार्क से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है। यहां करीब 40 साल बाद दुर्लभ जंगली बिल्ली शियागोश (केरेकल) की मौजूदगी दर्ज की गई है। पार्क में लगाए गए कैमरा ट्रैप में इसकी तस्वीर कैद हुई है। विशेषज्ञ इसे कुनो के बेहतर होते पारिस्थितिकी तंत्र और संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता मान रहे हैं, जो विलुप्तप्राय प्रजातियों की वापसी का संकेत है।
कैमरा ट्रैप में नजर आया दुर्लभ वन्यजीव
कुनो नेशनल पार्क में वन्यजीवों की निगरानी के लिए कई स्थानों पर कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। हाल ही में एक कैमरे में दुर्लभ केरेकल यानी शियागोश की तस्वीर रिकॉर्ड हुई। यह वन्यजीव पिछले चार दशक से इस क्षेत्र में दिखाई नहीं दिया था। इसके कैमरे में कैद होने से वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों में उत्साह का माहौल है।
क्या है शियागोश की खासियत?
शियागोश एक मध्यम आकार की बेहद फुर्तीली जंगली बिल्ली होती है। इसके लंबे और काले गुच्छेदार कान इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं। यह शिकार करने में बेहद दक्ष मानी जाती है और हवा में कई फीट ऊंची छलांग लगाकर पक्षियों को भी पकड़ सकती है। यह प्रजाति आमतौर पर घास के मैदानों, शुष्क क्षेत्रों और रेतीले इलाकों में निवास करना पसंद करती है।
भारत में बेहद कम बची है आबादी
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार भारत में शियागोश की संख्या लगातार घटती गई है। वर्तमान में देश में इनकी आबादी 50 से भी कम मानी जाती है। यही वजह है कि इसे उच्च संरक्षण श्रेणी में रखा गया है। राजस्थान और गुजरात के कुछ इलाकों में ही इसकी सीमित मौजूदगी दर्ज की जाती रही है। ऐसे में मध्य प्रदेश के कुनो में इसकी वापसी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कुनो बन रहा दुर्लभ प्रजातियों का सुरक्षित ठिकाना
पिछले एक वर्ष के दौरान कुनो में कई दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज हुई है। वन उल्लू, जंगली कुत्ता (ढोल) और भारतीय भेड़िया जैसे वन्यजीव यहां दिखाई दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण और आवास सुधार के प्रयासों से कुनो का पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हुआ है, जिससे विलुप्तप्राय प्रजातियां दोबारा यहां लौट रही हैं।
संरक्षण प्रयासों का सकारात्मक परिणाम
वन अधिकारियों का कहना है कि शियागोश का कैमरा ट्रैप में दिखाई देना एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि वन्यजीवों के लिए सुरक्षित और अनुकूल वातावरण तैयार हो रहा है। कुनो अब केवल चीतों के लिए ही नहीं, बल्कि कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण केंद्र के रूप में भी उभर रहा है।