मध्य प्रदेश की लाडली बहना योजना एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गई है। बीजेपी के एक मंत्री के विवादित बयान ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। योजना से जुड़ी महिलाओं में नाराजगी है, वहीं विपक्ष इसे सम्मान और अधिकार से जोड़कर बड़ा मुद्दा बना रहा है। भोपाल से लेकर जिलों तक विरोध के स्वर तेज होते जा रहे हैं और सवाल यह उठ रहा है कि क्या जनकल्याणकारी योजनाएं शर्तों से जुड़ी हो सकती हैं?
विवादित बयान से भड़का विरोध
लाडली बहना योजना को लेकर दिए गए एक बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। रतलाम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मंत्री कुंवर विजय शाह ने ऐसा बयान दिया, जिसे लेकर महिलाओं और विपक्षी दलों में नाराजगी फैल गई। बयान का आशय यह था कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने वाली महिलाओं को मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में उपस्थित होकर सम्मान प्रकट करना चाहिए, अन्यथा उनकी फाइलें जांच में डाली जा सकती हैं। बयान सामने आते ही इसे दबाव और धमकी से जोड़कर देखा जाने लगा।
महिला कांग्रेस का भोपाल में प्रदर्शन
बयान के बाद महिला कांग्रेस ने भोपाल में जोरदार प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में महिलाएं सड़कों पर उतरीं और मंत्री के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि लाडली बहना योजना कोई एहसान नहीं, बल्कि महिलाओं का अधिकार है। इसे राजनीतिक समर्थन से जोड़ना संविधान की भावना के खिलाफ है। महिला कांग्रेस ने मांग की कि मंत्री सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।
सरकार की सफाई, लेकिन सवाल बरकरार
विवाद बढ़ने पर मंत्री ने सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। उन्होंने मीडिया पर शब्दों को तोड़-मरोड़कर दिखाने का आरोप लगाया। हालांकि, इस सफाई से नाराजगी कम नहीं हुई। विपक्ष का कहना है कि यदि मंशा साफ होती तो बयान इस तरह का नहीं होता।
लाडली बहना योजना और राजनीति
लाडली बहना योजना के तहत राज्य की करीब 1 करोड़ 27 लाख महिलाओं को हर महीने 1500 रुपये दिए जा रहे हैं। भाई दूज के मौके पर राशि बढ़ाकर 1500 रुपये की गई थी। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का बड़ा कदम बता रही है, जबकि विपक्ष इसे चुनावी रणनीति करार दे रहा है। खासतौर पर आदिवासी और महिला वोट बैंक को ध्यान में रखकर इस योजना को बेहद अहम माना जा रहा है।
वादा 3000 का, बहस अधिकार की
सरकार का दावा है कि भविष्य में लाडली बहनों को 3000 रुपये प्रतिमाह देने का वादा भी पूरा किया जाएगा। लेकिन मौजूदा विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सरकारी योजनाएं जनता का हक हैं या फिर समर्थन के बदले शर्त? यही सवाल इस पूरे आंदोलन की धुरी बन गया है।