मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक महिला शिक्षिका की मौत ने प्रशासनिक दबाव और सर्वे कार्यों के बोझ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राथमिक शाला की शिक्षिका लक्ष्मी जारोलिया बीते कई दिनों से ‘SIR’ सर्वे और बीएलओ कार्यों का भारी मानसिक तनाव झेल रही थीं। परिवार का आरोप है कि उनसे रोजाना रात 12 बजे तक रिपोर्ट तैयार करने, फॉर्म भरने और डाटा भेजने का दबाव था, जिसने उनकी सेहत बिगाड़ दी और अंततः जान ले ली।
सर्वे प्रेशर के बीच बिगड़ी तबीयत
सागर जिले की निवारी प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षिका लक्ष्मी जारोलिया पिछले कई दिनों से लगातार सर्वे और बीएलओ कार्यों में लगी थीं। परिवार के अनुसार, ‘SIR’ सर्वे ने काम का दबाव कई गुना बढ़ा दिया था। सुबह से देर रात तक फॉर्म भरने और सूचनाएं भेजने का आदेश मिल रहा था। इसी दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा।
दस दिन तक जिंदगी की जंग लड़ती रहीं
करीब दस दिन पहले सर्वे के दौरान ही लक्ष्मी को हार्ट अटैक आया। पहले उन्हें सागर के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, बाद में गंभीर स्थिति के चलते भोपाल रेफर किया गया। उपचार के दौरान हालात सुधारने के प्रयास किए गए, लेकिन लगातार मानसिक और शारीरिक तनाव उनके लिए घातक साबित हुआ और रविवार को उनका निधन हो गया।
तकनीकी समस्याओं ने बढ़ाया दबाव
लक्ष्मी जारोलिया के बेटे देवांशु के अनुसार, मोबाइल सही से न चलने के कारण ऑनलाइन कार्यों में दिक्कत आती थी। बावजूद इसके उनसे देर रात तक रिपोर्टिंग का दबाव बनाया जाता था। रोजाना 12 बजे तक काम खत्म करने के आदेश और लगातार डाटा भेजने की बाध्यता ने उनकी मानसिक स्थिति को कमजोर कर दिया था।
परिवार की एकमात्र सहारा थीं
लक्ष्मी जारोलिया अपने परिवार की एकमात्र कमाने वाली सदस्य थीं। पति की पहले ही मौत हो चुकी थी। पीछे दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी और बेटे की शादी हो चुकी है, लेकिन पूरा परिवार आर्थिक रूप से उन्हीं पर निर्भर था। अचानक हुई इस दुखद घटना ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है।
शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ को लेकर उठे सवाल
इस घटना ने शिक्षकों पर सर्वे और बीएलओ ड्यूटी के अत्यधिक बोझ पर फिर से बहस छेड़ दी है। लंबे समय से शिक्षक संगठन गैर-शैक्षणिक कार्यों के बढ़ते दबाव को लेकर आपत्ति जताते रहे हैं। लक्ष्मी की मौत ने एक बार फिर इस प्रशासनिक प्रणाली की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं, जिसमें शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्य थोपे जाने से उनकी सेहत और जीवन तक खतरे में पड़ रहा है।