बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर सियासी उथल-पुथल मच गई है। आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए अपने प्रत्याशियों को टिकट और सिंबल देना शुरू कर दिया, ठीक उसी तरह जैसे अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में किया था। लेकिन कांग्रेस की नाराजगी और तेजस्वी यादव के हस्तक्षेप के बाद लालू का यह दांव पलट गया। अब सवाल यह है कि लालू की यह ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ आखिर क्यों बेअसर हो गई?
सीट बंटवारे को लेकर महागठबंधन में असमंजस
बिहार विधानसभा चुनाव के दो चरणों के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन महागठबंधन के दलों के बीच सीट शेयरिंग फॉर्मूला तय नहीं हो पाया है। आरजेडी, कांग्रेस, वीआईपी और वाम दलों के बीच सीटों को लेकर सहमति नहीं बन पाई है। इसी खींचतान के बीच लालू प्रसाद यादव ने अपने उम्मीदवारों को टिकट और सिंबल देकर सियासी चाल चली।
लालू ने अपने उम्मीदवारों को दिया सिंबल
लालू यादव ने बिना आधिकारिक सीट बंटवारे के ही कई सीटों पर अपने प्रत्याशियों को पार्टी का सिंबल सौंप दिया। इनमें मनेर से भाई वीरेंद्र, मसौढ़ी से रेखा पासवान, मटिहानी से बोगो सिंह, परबत्ता से डॉ. संजीव कुमार, हथुआ से राजेश कुमार और संदेश से दीपू राणावत शामिल हैं। लालू का यह कदम कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा गया।
तेजस्वी के पटना लौटते ही बदला सियासी खेल
तेजस्वी यादव के दिल्ली से पटना लौटते ही सियासी समीकरण बदल गया। कांग्रेस ने नाराजगी जताते हुए कहा कि सीट बंटवारे की आधिकारिक घोषणा से पहले सिंबल देना अनुचित है। इसके बाद आरजेडी ने आधी रात को सभी प्रत्याशियों को राबड़ी आवास बुलाकर फॉर्म-बी वापस मंगवा लिया। लालू की ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ यहीं ठंडी पड़ गई।
अखिलेश की तरह क्यों नहीं चला लालू का दांव
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने जब कांग्रेस पर दबाव बनाया था, तब कांग्रेस लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी साझेदारी चाहती थी। वहीं बिहार में कांग्रेस की प्राथमिकता सीमित है और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उसकी दावेदारी नहीं। यही वजह रही कि कांग्रेस ने आरजेडी के दबाव को नजरअंदाज कर दिया और तेजस्वी ने समझौते की राह चुनी।
तेजस्वी की रणनीति – टकराव नहीं, तालमेल
तेजस्वी यादव जानते हैं कि बिहार चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य के लिए निर्णायक है। ऐसे में वे किसी भी सूरत में कांग्रेस से टकराव नहीं चाहते। यही कारण है कि लालू का टिकट वितरण का फैसला वापस लेकर उन्होंने संकेत दिया कि आरजेडी गठबंधन की एकता को प्राथमिकता देगी, भले ही दबाव की राजनीति फिलहाल काम न आई हो।