भारत, चीन और नेपाल के बीच स्थित लिपुलेख दर्रा एक बार फिर विवाद का केंद्र बन गया है। कई साल बाद इस रास्ते से कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने के फैसले ने नेपाल की चिंता बढ़ा दी है। नेपाल इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जबकि भारत इसे अपना हिस्सा मानता है। ऐसे में यह मामला अब सिर्फ सीमा विवाद नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक मुद्दा बन चुका है।
नेपाल के लिए बढ़ी राजनीतिक चुनौती
नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा काफी संवेदनशील बन गया है। खासकर बालेन शाह सरकार के लिए यह एक बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। नेपाल में पहले भी केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में इस विवाद को जोर-शोर से उठाया गया था। अब सवाल यह है कि मौजूदा सरकार भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के सामने कितनी मजबूती से अपनी बात रख पाएगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर ने बढ़ाई तनातनी
2020 में भारत ने सीमा सड़क संगठन के जरिए उत्तराखंड से लिपुलेख तक सड़क बना दी, जिससे कैलाश मानसरोवर यात्रा आसान हो गई। पहले जहां तीर्थयात्रियों को लंबा पैदल सफर करना पड़ता था, अब गाड़ियों से पहुंचना संभव हो गया है। लेकिन नेपाल का दावा है कि यह सड़क उसके क्षेत्र से गुजरती है, जबकि भारत इसे पूरी तरह अपने नियंत्रण वाला इलाका बताता है।
चीन का रुख भी दिलचस्प
इस पूरे विवाद में चीन की भूमिका भी अहम है। भले ही भारत और चीन ने कई मामलों में साथ मिलकर काम किया हो, लेकिन चीन ने नेपाल के दावे को खुलकर समर्थन नहीं दिया। 2023 में जारी अपने नक्शे में चीन ने इस इलाके को भारत के हिस्से के रूप में दिखाया था, जिससे नेपाल नाराज हो गया। इससे साफ है कि इस विवाद में नेपाल खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है।
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सुगौली संधि से जुड़ा विवाद
नेपाल का दावा 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है। इस संधि में काली नदी को सीमा माना गया था, लेकिन विवाद इस बात पर है कि नदी का असली उद्गम कहां है। इसी आधार पर कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख जैसे क्षेत्रों पर दावा किया जाता है। भारत और नेपाल इस संधि की अलग-अलग व्याख्या करते हैं, जिससे विवाद अब तक सुलझ नहीं पाया है।
त्रिपक्षीय विवाद की ओर बढ़ता मामला
अब यह मुद्दा सिर्फ भारत-नेपाल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत-चीन-नेपाल के बीच त्रिपक्षीय विवाद बनता जा रहा है। भारत और चीन ने व्यापार और यात्रा के लिए इस रास्ते को सक्रिय रखा है, जबकि नेपाल विरोध जता रहा है। लेकिन आर्थिक और कूटनीतिक निर्भरता के चलते नेपाल की स्थिति कमजोर नजर आती है। ऐसे में इस विवाद का हल आसान नहीं दिख रहा है।