LNG Prices : अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण गैस और तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर एशियाई देशों पर पड़ रहा है, जिनमें भारत भी शामिल है।
कतर से सस्ती गैस की सप्लाई प्रभावित
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों को लंबे समय से कतर से अपेक्षाकृत सस्ती एलएनजी मिलती रही है। लेकिन सप्लाई बाधित होने के बाद इन देशों को अब खुले बाजार से गैस खरीदनी पड़ रही है। खुले बाजार में कीमतें पहले से काफी ज्यादा हैं, जिससे ऊर्जा आयात का खर्च तेजी से बढ़ गया है।
दोगुने से ज्यादा बढ़ा खर्च
रिपोर्ट के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद इन देशों ने स्पॉट बाजार से एलएनजी खरीदने पर करीब 7.4 अरब डॉलर खर्च किए हैं। पिछले वर्ष इसी मात्रा की गैस के लिए लगभग 3.1 अरब डॉलर खर्च हुए थे। यानी लागत दोगुने से भी अधिक हो गई है। भारत समेत कई देशों पर इसका अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है।
बिजली और उद्योग पर पड़ सकता है असर
महंगी गैस का असर केवल ऊर्जा कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। गैस का इस्तेमाल बिजली उत्पादन, उर्वरक उद्योग, स्टील, प्लास्टिक और कई अन्य क्षेत्रों में होता है। ऐसे में उत्पादन लागत बढ़ने से कई उत्पाद महंगे हो सकते हैं। बिजली उत्पादन की लागत बढ़ने पर राज्यों और कंपनियों पर भी अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
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एलपीजी सिलेंडर पर क्या होगा असर?
एलपीजी और एलएनजी अलग-अलग उत्पाद हैं, लेकिन दोनों की कीमतें वैश्विक ऊर्जा बाजार से प्रभावित होती हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस और कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। हालांकि सिलेंडर के दाम बढ़ेंगे या नहीं, इसका फैसला सरकार और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य समीक्षा पर निर्भर करेगा।
विकल्प तलाश रहे देश
महंगी गैस से बचने के लिए कई देश अब सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और कोयले जैसे विकल्पों पर जोर दे रहे हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एलएनजी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो कई देश गैस की खपत कम करने और वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ सकते हैं।