हर साल होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि सदियों पुरानी शिल्पकला और परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है. रथ निर्माण का जिम्मा विशिष्ट परिवारों के कारीगरों—‘बिस्वाकर्मा’ या ‘महारणा’—पर होता है, जो पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहे हैं.
रथ निर्माण में शामिल होते हैं कई शिल्प विशेषज्ञ
रथ बनाने की प्रक्रिया में बढ़ई, लौहकार, रूपकार और चित्रकार शामिल होते हैं. महारणा रथ के ढांचे का निर्माण करते हैं, लौहकार जरूरी धातु उपकरण गढ़ते हैं, रूपकार लकड़ी पर नक्काशी करते हैं और चित्रकार पट्टचित्र शैली में चित्रांकन करते हैं.
विशेष लकड़ी और पारंपरिक तकनीकें
इन विशाल रथों के लिए नीम, फस्सी और सराय की लकड़ियों का प्रयोग होता है, जो ओडिशा सरकार चिन्हित वनों से प्राप्त होती हैं. निर्माण में लोहे की कीलों की बजाय लकड़ी की कीलें और ‘सलाबंधा’ तकनीक का प्रयोग होता है.
रथ यात्रा की पवित्र तिथि और समापन परंपरा
इस वर्ष रथ यात्रा 27 जून, 2025 को मनाई जाएगी. यात्रा के बाद, रथों को विधिपूर्वक तोड़ा जाता है. प्रमुख लकड़ियों की नीलामी होती है और बाकी लकड़ी से भगवान के लिए प्रसाद पकाया जाता है.
रथ यात्रा: श्रद्धा और शिल्प का अनूठा उत्सव
जगन्नाथ रथ यात्रा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विरासत और शिल्प की उत्कृष्टता का प्रतीक भी है, जहां भक्ति और कला एक साथ चलती हैं.