Maa Skandamata Katha: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप की आराधना की जाती है। देवी का यह रूप मातृत्व, करुणा और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को सुख-समृद्धि और शांति का आशीर्वाद मिलता है। इनकी पौराणिक कथा भगवान कार्तिकेय के जन्म और दुष्ट असुर तारकासुर के वध से जुड़ी हुई है। आइए जानते हैं मां स्कंदमाता की कथा, उनके स्वरूप का महत्व और पूजा के दौरान किए जाने वाले मंत्र जाप के बारे में।
जब तारकासुर के आतंक से परेशान हो गए देवता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में तारकासुर नाम का एक बलशाली असुर था। वह अपनी शक्तियां बढ़ाकर तीनों लोकों पर अधिकार करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए लंबे समय तक घोर तप किया। उसकी साधना से संतुष्ट होकर ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिए और मनचाहा वरदान मांगने को कहा। तारकासुर ने चतुराई दिखाते हुए यह वर मांगा कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो। उसे लगता था कि भगवान शिव तपस्या में लीन रहते हैं और उनके पुत्र का जन्म होना आसान नहीं होगा। इसी भरोसे में उसने स्वयं को अजेय समझना शुरू कर दिया। वरदान प्राप्त करने के बाद तारकासुर का अत्याचार बढ़ने लगा। वह देवताओं और ऋषि-मुनियों को परेशान करने लगा। उसके भय से सभी देवता चिंतित हो उठे। चूंकि उसका अंत भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव था, इसलिए देवताओं ने शिवजी और माता पार्वती से सहायता की गुहार लगाई।
भगवान कार्तिकेय का हुआ जन्म
देवताओं की प्रार्थना और पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र के रूप में कार्तिकेय का जन्म हुआ। उन्हें स्कंद नाम से भी जाना जाता है। माता पार्वती ने अपने पुत्र का पालन-पोषण किया और उन्हें शक्ति, साहस तथा युद्ध कौशल से संपन्न बनाया। जब कार्तिकेय युद्ध के योग्य हो गए, तो देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का नेतृत्व सौंप दिया। सभी को उम्मीद थी कि भगवान कार्तिकेय ही तारकासुर के आतंक से मुक्ति दिला सकते हैं।
भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर को युद्ध में हराया
तारकासुर के बढ़ते अत्याचारों को समाप्त करने के लिए भगवान कार्तिकेय ने देवताओं की सेना के साथ युद्ध किया। दोनों पक्षों के बीच भीषण संघर्ष हुआ। अंततः कार्तिकेय ने अपने पराक्रम से तारकासुर का वध कर दिया। तारकासुर के अंत के साथ देवताओं को उसके भय से मुक्ति मिली। तीनों लोकों में फिर से शांति स्थापित होने की उम्मीद जगी। इस तरह भगवान कार्तिकेय ने देवताओं की रक्षा की और अपनी वीरता का परिचय दिया।
इस वजह से मां पार्वती कहलाती हैं स्कंदमाता
भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद है। उनकी माता होने के कारण देवी पार्वती को स्कंदमाता के नाम से पूजा जाता है। नवरात्रि के पांचवें दिन भक्त देवी के इसी स्वरूप की उपासना करते हैं। मां स्कंदमाता की प्रतिमा में देवी अपने पुत्र कार्तिकेय को गोद में धारण किए हुए दिखाई देती हैं। धार्मिक मान्यताओं में उनका यह रूप ममता, वात्सल्य और शक्ति का सुंदर संगम माना गया है। देवी की आराधना करते समय भक्त अपने परिवार की सुख-शांति, संतान की खुशहाली और जीवन में सकारात्मकता की कामना करते हैं।
मां स्कंदमाता की पूजा में करें इस मंत्र का जाप
नवरात्रि की पंचमी तिथि पर मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना के साथ उनके मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। भक्त श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का 11 बार जाप कर सकते हैं।
मंत्र:
सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
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धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से मां स्कंदमाता की आराधना करने से भक्तों को मानसिक शांति, साहस और परिवार के कल्याण का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।