भोपाल। मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 28 अगस्त को बड़ा कदम उठाया। उन्होंने अपने निवास पर सर्वदलीय बैठक बुलाकर इस विषय पर चर्चा की। बैठक में सभी दल एकमत होकर इस बात पर सहमत हुए कि प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% आरक्षण किसी भी स्थिति में दिया जाएगा। इसके लिए सर्वसम्मति से एक संकल्प भी पारित किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी अभ्यर्थी को नौकरी से वंचित नहीं होना चाहिए। यह प्रकरण फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, जहां 22 सितंबर से रोजाना सुनवाई होगी।
सर्वदलीय बैठक में सर्वसम्मति
बैठक में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेता शामिल हुए। सभी दलों ने मिलकर यह तय किया कि ओबीसी आरक्षण को लेकर न्यायालय में एक ही पक्ष रखा जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि अलग-अलग वकीलों के तर्कों से भ्रम की स्थिति बन रही है, इसलिए 10 सितंबर तक सभी वकीलों को मिलकर एकमत रणनीति तय करनी होगी।
लंबी कानूनी जंग और अदालत की सुनवाई
मध्यप्रदेश सरकार ने 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% किया था। इसके बाद विभिन्न याचिकाएं दायर हुईं और अदालतों में मामला लंबित हो गया। कई भर्ती परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं पर रोक लगी। फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय 22 सितंबर 2025 से इस पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगा।
सरकार और आयोग के प्रयास
राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में दायर विभिन्न याचिकाओं को एक साथ समेकित कराया। साथ ही 2021 में पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग का गठन किया गया, जिसने कई प्रतिवेदन प्रस्तुत किए। आयोग ने सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन करते हुए ओबीसी आरक्षण को उचित ठहराया। वहीं, सरकार ने परीक्षाओं में अस्थायी समाधान के लिए 87% और 13% फॉर्मूले पर परिणाम घोषित करने का निर्देश दिया था।
युवाओं को मिले पूरा लाभ
मुख्यमंत्री ने कहा कि 14% आरक्षण पहले ही लागू हो चुका है, लेकिन शेष 13% के कारण कई अभ्यर्थी उम्र सीमा से बाहर हो रहे हैं। इस समस्या का जल्द समाधान हो, ताकि कोई भी अभ्यर्थी नौकरी से वंचित न रह जाए।