विदिशा जिले की ग्यारसपुर तहसील के ग्राम मनोरा में भगवान जगन्नाथ की लगभग 300 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक रथयात्रा परंपरागत श्रद्धा और उल्लास के साथ निकाली गई। तड़के सुबह मंदिर से रवाना हुए भगवान के रथ के दर्शन के लिए प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। तीन दिवसीय धार्मिक मेले को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा और यातायात की व्यापक व्यवस्थाएं की हैं।
सुबह 5 बजे शुरू हुई ऐतिहासिक रथयात्रा
ग्राम मनोरा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सुबह 5 बजे मंदिर से विधि-विधान के साथ प्रारंभ हुई। भगवान के रथ के निकलते ही पूरा क्षेत्र जय जगन्नाथ के जयघोष और भक्ति गीतों से गूंज उठा। श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ रथयात्रा में शामिल हुए और भगवान के दर्शन कर पूजा-अर्चना की। आयोजन में प्रदेश के कई जिलों के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु अपने परिवारों के साथ पहुंचे।
तीन दिवसीय मेले में दो लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान
रथयात्रा के साथ आयोजित तीन दिवसीय मेले में करीब दो लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान लगाया गया है। धार्मिक आयोजन के साथ मेले में भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हो रहे हैं। ग्रामीण परंपरा और धार्मिक आस्था का यह संगम हर वर्ष क्षेत्र के सबसे बड़े आयोजनों में शामिल माना जाता है। श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित कर रहे हैं।
सुरक्षा के लिए ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी
आयोजन को शांतिपूर्ण और सुरक्षित बनाए रखने के लिए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। 500 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके अलावा 35 से अधिक सीसीटीवी कैमरों के जरिए पूरे आयोजन पर नजर रखी जा रही है। ड्रोन की मदद से भी लगातार निगरानी की जा रही है ताकि किसी भी स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।
यातायात और पार्किंग की विशेष व्यवस्था
श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर से लगभग 200 मीटर पहले खेतों में अस्थायी पार्किंग की व्यवस्था की गई। वहीं सागर मार्ग पर यातायात को डायवर्ट कर आवागमन को सुचारु बनाया गया। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी पूरे आयोजन के दौरान लगातार व्यवस्थाओं की निगरानी करते रहे।
तीन शताब्दियों से कायम है आस्था की परंपरा
करीब 300 वर्षों से आयोजित हो रही मनोरा की यह रथयात्रा आज भी क्षेत्र की धार्मिक पहचान बनी हुई है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ के दर्शन करते हैं। धार्मिक परंपरा, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत का यह उत्सव आज भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।