प्रयागराज में माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के दिन हुई एक घटना अब अदालत तक पहुंच गई है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके बटुक शिष्यों के साथ कथित मारपीट का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में उठाया गया है। अधिवक्ता गौरव द्विवेदी की ओर से इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर पूरे मामले की शिकायत की गई है। इस याचिका के बाद प्रशासनिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है।
पालकी रोकने से शुरू हुआ विवाद
याचिका में बताया गया है कि माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी को पुलिस ने जबरन रोक दिया। आरोप है कि यह सब उस समय हुआ जब धार्मिक अनुष्ठान किया जा रहा था। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस कार्रवाई से न सिर्फ धार्मिक परंपराओं में बाधा पहुंची बल्कि पूरे संत समाज की भावनाओं को भी ठेस लगी। इसी घटना को पूरे विवाद की जड़ बताया गया है।
बटुक शिष्यों से दुर्व्यवहार का आरोप
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि शंकराचार्य के साथ मौजूद बटुक शिष्यों के साथ पुलिस ने दुर्व्यवहार किया। दावा किया गया है कि कुछ बटुक नाबालिग थे, इसके बावजूद उन्हें हिरासत में लिया गया। यही नहीं, हिरासत के दौरान उनके साथ मारपीट किए जाने का भी आरोप लगाया गया है। इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीर बताया गया है।
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कानून के उल्लंघन की बात
अधिवक्ता की ओर से कहा गया है कि नाबालिग बटुकों को हिरासत में लेना और उनके साथ मारपीट करना किशोर न्याय अधिनियम 2015 का सीधा उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि माघ मेले जैसे धार्मिक आयोजन में इस तरह की कार्रवाई संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। इसे सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि कानून तोड़ने वाला कदम बताया गया है।
सीबीआई जांच और कार्रवाई की मांग
इस मामले में याचिकाकर्ता ने मांग की है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई से कराई जाए। साथ ही जिन पुलिस अधिकारियों पर आरोप लगे हैं, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें निलंबित किया जाए। याचिका में साफ कहा गया है कि जब तक स्वतंत्र एजेंसी से जांच नहीं होगी, सच्चाई सामने नहीं आएगी।
अब सबकी नजर कोर्ट के अगले कदम पर
फिलहाल यह मामला हाईकोर्ट के संज्ञान में आ चुका है। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि अदालत इस याचिका पर क्या रुख अपनाती है। क्या मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाएगी या प्रशासन से जवाब मांगा जाएगा, इसका फैसला आने वाले दिनों में होगा। इतना तय है कि माघ मेले की यह घटना अब कानूनी और राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।