उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में आज एक बार फिर आस्था की पहचान – स्वर्ण मंडित धर्म ध्वज को विधिपूर्वक शिखर पर स्थापित कर दिया गया। बीते दिनों तेज आंधी के कारण यह ध्वज अपने स्थान से खिसक गया था, जिसे सावधानीपूर्वक उतारकर वैदिक रीति से संधारित किया गया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी श्रद्धालु को भगवान महाकालेश्वर के गर्भगृह में दर्शन नहीं मिल पाए, तो मंदिर के शिखर दर्शन मात्र से ही उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है। स्कंद पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में इस ध्वज का विशेष उल्लेख मिलता है, जिसे आज फिर से श्रद्धा और विधि-विधान के साथ स्थापित किया गया। ध्वज की पुनर्स्थापना का यह आयोजन मंदिर परिसर में भक्तों के बीच श्रद्धा का केंद्र बन गया।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार हुआ पुनः स्थापना का कार्य
महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति द्वारा स्वर्ण मंडित ध्वज को विधिपूर्वक उतारा गया था और फिर उप प्रशासक सिम्मी यादव के मार्गदर्शन में उसका नव श्रृंगार और संधारण कर पुनः स्थापना की गई। ध्वज पूजन का कार्य सहायक प्रशासकों मूलचंद जूनवाल और प्रतीक द्विवेदी द्वारा संपन्न किया गया।
12 किलो वजनी ध्वज के लिए बना विशेष मचान
तांबा और पीतल से निर्मित इस 12 किलो वजनी ध्वज को मंदिर के ऊंकारेश्वर मठ की छत से विशेष मचान के जरिए शिखर तक पहुंचाया गया। सुरक्षा मानकों का पूरा पालन करते हुए कुशल कारीगरों ने इसे फिर से यथा स्थान पर स्थापित किया।
शिखर दर्शन का आध्यात्मिक महत्व
सनातन परंपरा के अनुसार, “शिखर दर्शनम पाप नाशनम्” – अर्थात यदि गर्भगृह के दर्शन न हो पाएं, तो मंदिर के शिखर दर्शन मात्र से ही सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस आस्था ने आज फिर उज्जैन में श्रद्धालुओं को अभिभूत कर दिया।