मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक छोटे से गांव अजरोड़ा के किसान जितेंद्र नागर ने लहसुन की खेती में देसी फार्मूला अपनाकर ऐसा कमाल कर दिखाया है, जो अब पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। ‘महाकाल लहसुन’ के नाम से प्रसिद्ध हो चुका यह उत्पाद अब मंडियों में ऊटी और सुपर शंकर जैसे ब्रांड को भी चुनौती दे रहा है।
देसी तरीका, जबरदस्त उत्पादन
जितेंद्र नागर ने पारंपरिक खेती से हटकर लहसुन की खेती में अपना इनोवेशन आजमाया। उन्होंने खेत की गहरी जुताई पांच महीने पहले शुरू की, देसी खाद का उपयोग किया और बाजार से खरीदे बीज की जगह स्वयं तैयार किए बीज लगाए। सिंचाई के लिए भी विशेष प्लानिंग अपनाई और एक सीजन में सात से आठ बार पानी दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि जहां पहले एक बीघा में 8-9 क्विंटल लहसुन मिलता था, अब उत्पादन बढ़कर 18 से 20 क्विंटल तक पहुंच गया है।
गांव में बन गया मॉडल फार्मिंग सेंटर
जितेंद्र की सफलता से प्रेरित होकर अजरोड़ा गांव के अन्य किसान भी लहसुन की ओर मुड़ गए हैं। आज गांव के 300 बीघा खेतों में लहसुन की खेती हो रही है और प्रति बीघा करीब एक लाख रुपये तक का मुनाफा हो रहा है। अब यह गांव लहसुन उत्पादन का हब बन गया है, जहां की पैदावार राजस्थान के छीपाबड़ौद और छबड़ा मंडियों में ‘महाकाल लहसुन’ नाम से बिकती है।
पारंपरिक फसलों को पीछे छोड़ रहा लहसुन
पहले यहां गेहूं, चना, सरसों और धनिया जैसी फसलें ली जाती थीं, जो मौसम पर निर्भर थीं। लेकिन अब किसान लहसुन को ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी मान रहे हैं, क्योंकि यह जमीन के भीतर उगने वाली फसल है और इसे आंधी-पानी का उतना खतरा नहीं होता।
दाम में उतार-चढ़ाव, लेकिन प्लानिंग से मुनाफा तय
हालांकि, लहसुन की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रहता है। पिछले साल जहां यह 35 हजार रुपये क्विंटल तक बिका, वहीं इस साल दाम गिरकर 6-7 हजार रह गए। लेकिन किसान अब इसे एकसाथ बेचने की बजाय स्टोरेज और प्रोसेसिंग कर सालभर में हिस्सों में बेचते हैं। इस रणनीति से उनकी आमदनी स्थिर बनी रहती है।