Mahakaleshwar Jyotirlinga :सावन के पावन महीने में लाखों श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं बाबा महाकाल के दर्शन के लिए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना कैसे और कब हुई? उज्जैन में स्थित यह ज्योतिर्लिंग न केवल द्वादश ज्योतिर्लिंगों में तीसरे स्थान पर आता है, बल्कि इसकी विशेषता यह है कि यह दक्षिणमुखी है, जो इसे अत्यंत दुर्लभ और पवित्र बनाता है। इस ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने से जुड़ी कथाएं भक्तों को आज भी रोमांचित करती हैं।
राजा चंद्रसेन की भक्ति और बालक की आस्था से प्रकट हुए भगवान शिव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन के राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्हें शिवगण मणिभद्र द्वारा एक दिव्य चिंतामणि प्राप्त हुई थी, जिससे उनकी ख्याति बढ़ने लगी। इसी ईर्ष्या में अन्य राजाओं ने उज्जैन पर आक्रमण कर दिया। संकट में राजा चंद्रसेन भगवान शिव की आराधना में लीन हो गए। उसी समय एक विधवा अपने पांच वर्षीय पुत्र के साथ मंदिर आई। बालक ने राजा की भक्ति देख स्वयं भी घर जाकर शिवलिंग बनाकर पूजन शुरू किया। उसकी मां ने क्रोध में पूजा सामग्री फेंक दी। तभी भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गए और उनके साथ एक स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भी प्रकट हुआ। यहीं से महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना मानी जाती है।
राक्षस दूषण के वध के बाद शिव ने धरती पर किया स्थायी निवास
एक अन्य कथा के अनुसार अवंतिका नगरी में वेदप्रिय नामक ब्राह्मण शिव भक्त थे। जब रत्नमाल पर्वत से दूषण नामक राक्षस ने उत्पात मचाना शुरू किया और धार्मिक अनुष्ठानों में विघ्न डालने लगा, तब भगवान शिव ‘महाकाल’ रूप में धरती चीरकर प्रकट हुए और दूषण का वध किया। इसके बाद उन्होंने राक्षस की भस्म से अपना श्रृंगार किया और ब्राह्मणों की प्रार्थना पर वहीं स्थायी रूप से विराजमान हो गए।
आस्था, चमत्कार और श्रद्धा का प्रतीक है महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग
यह चमत्कारी ज्योतिर्लिंग उज्जैन में श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र है। यहां हर साल करोड़ों श्रद्धालु सावन और महाशिवरात्रि के मौके पर बाबा महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं। यह स्थान शिव की अपार शक्ति और भक्तों की सच्ची आस्था का प्रतीक है।